Political GeographyChapter Unit
अविकसितता और अंतर्राष्ट्रीय नीतियाँ
1. अविकसितता का अर्थ
- अविकसितता वह स्थिति है जब कोई देश आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी रूप से विकसित देशों की तुलना में पिछड़ा होता है।
- इसमें निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं:
- आर्थिक असमानता
- संसाधनों की कमी
- तकनीकी और औद्योगिक पिछड़ापन
- उच्च बेरोजगारी दर
- गरीब जीवन स्तर
2. अविकसितता के कारण
- औपनिवेशिक इतिहास: कई देशों को उनके प्राकृतिक संसाधनों और श्रम का शोषण कर आर्थिक रूप से कमजोर किया गया।
- प्राकृतिक संसाधनों की कमी: कई देशों में खनिज और ऊर्जा स्रोतों की कमी है।
- तकनीकी ज्ञान का अभाव: नई तकनीकों की कमी के कारण उत्पादन और निर्यात सीमित रहता है।
- राजनीतिक अस्थिरता: स्थिर सरकारों की कमी से विकास बाधित होता है।
- आर्थिक नीतियों की असफलता: अनियमित और अक्षम नीतियाँ आर्थिक विकास को रोकती हैं।
3. अंतर्राष्ट्रीय नीतियाँ और उनका प्रभाव
- अंतर्राष्ट्रीय नीतियाँ अविकसित देशों पर निम्नलिखित तरीकों से प्रभाव डालती हैं:
- ऋण और अनुदान: विकासशील देशों को सहायता प्रदान करने की नीतियाँ।
- व्यापार नीति: विकसित देशों के साथ असंतुलित व्यापार से अविकसित देश और अधिक कमजोर होते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र और अन्य संस्थाएँ: विकासशील देशों की सहायता के लिए योजनाएँ और कार्यक्रम।
- बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ: ये कंपनियाँ अक्सर अविकसित देशों में सस्ते श्रम का लाभ उठाती हैं।
4. अंतर्राष्ट्रीय नीतियों के सुधार के उपाय
- समानता पर आधारित व्यापार: व्यापार नीतियों में निष्पक्षता।
- विकास परियोजनाओं में निवेश: शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे में निवेश।
- स्थानीय संसाधनों का उपयोग: स्थानीय तकनीक और श्रम को प्राथमिकता देना।
- क्षेत्रीय सहयोग: अन्य विकासशील देशों के साथ सहयोग।
उत्तर-दक्षिण संवाद (North-South Dialogues)
उत्तर-दक्षिण संवाद का परिचय
- उत्तर-दक्षिण संवाद का अर्थ है विकसित (उत्तर) और विकासशील/अविकसित (दक्षिण) देशों के बीच संवाद।
- यह संवाद मुख्य रूप से आर्थिक असमानताओं को कम करने, संसाधनों के न्यायसंगत वितरण और एक नया अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order - NIEO) स्थापित करने पर केंद्रित है।
- यह 1970 के दशक में उभरा, जब विकासशील देशों ने अपने अधिकारों और आवश्यकताओं के लिए संगठित तरीके से आवाज उठाई।
उत्तर और दक्षिण देशों का वर्गीकरण
- उत्तर (Developed Nations)
- विकसित और औद्योगिक रूप से समृद्ध देश।
- उदाहरण: अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस।
- विशेषताएँ: उच्च जीवन स्तर, उन्नत तकनीक, मजबूत अर्थव्यवस्था।
- दक्षिण (Developing/Underdeveloped Nations)
- विकासशील और अविकसित देश।
- उदाहरण: भारत, अफ्रीका के देश, लातिन अमेरिका के देश।
- विशेषताएँ: निम्न जीवन स्तर, प्राकृतिक संसाधनों का शोषण, तकनीकी और औद्योगिक पिछड़ापन।
उत्तर-दक्षिण संवाद की पृष्ठभूमि
- औपनिवेशिक काल के दौरान दक्षिण के देशों के प्राकृतिक संसाधनों का उत्तर के देशों द्वारा शोषण किया गया।
- विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि आधारित थी, जबकि विकसित देशों ने औद्योगिकीकरण को अपनाया।
- 20वीं शताब्दी के मध्य में, विकासशील देशों ने वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपनी भागीदारी बढ़ाने की माँग की।
- दक्षिण के देशों ने NIEO के तहत अपनी माँगें प्रस्तुत कीं, जैसे:
- व्यापार में न्यायसंगतता।
- कच्चे माल की कीमतों में स्थिरता।
- तकनीकी और वित्तीय सहायता।
मुख्य मुद्दे और मांगें
- संसाधनों का समान वितरण: प्राकृतिक संसाधनों पर विकासशील देशों का अधिकार।
- आर्थिक सहयोग: व्यापारिक असमानताओं को समाप्त करना।
- तकनीकी हस्तांतरण: विकसित देशों से तकनीक साझा करना।
- वित्तीय सहायता: ऋण राहत और आर्थिक अनुदान।
- ग्लोबल गवर्नेंस में भागीदारी: अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाना।
उत्तर-दक्षिण संवाद की प्रक्रिया
- संयुक्त राष्ट्र का योगदान:
- UNCTAD (United Nations Conference on Trade and Development) की स्थापना।
- NIEO की पहल।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM): विकासशील देशों की आवाज को मजबूती प्रदान करना।
- दक्षिण-दक्षिण सहयोग: विकासशील देशों के बीच सहयोग बढ़ाना।
उत्तर-दक्षिण संवाद के प्रभाव
- कुछ महत्वपूर्ण सुधार हुए, जैसे:
- वित्तीय संस्थानों (IMF, World Bank) द्वारा ऋण और सहायता।
- दक्षिण देशों की मांगों पर चर्चा।
- हालांकि, विकसित देशों का प्रभुत्व और असमानताओं का पूर्ण समाधान नहीं हुआ।
उत्तर-दक्षिण संवाद की चुनौतियाँ
- राजनीतिक असमानता: विकासशील देशों की आवाज कमजोर रही।
- आर्थिक प्रभुत्व: विकसित देशों की नीतियों का दबदबा।
- सहमति की कमी: विकासशील देशों के बीच विचारों की असमानता।
- वित्तीय संकट: वैश्विक आर्थिक अस्थिरता का प्रभाव।
आगे का रास्ता
- समानता आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रणाली।
- विकासशील देशों को प्रौद्योगिकी और वित्तीय सहायता।
- ग्रीन एनर्जी और सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर सहयोग।
- वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया।
नए अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order - NIEO) में SAARC और ASEAN की भूमिका
नए अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) का परिचय
- NIEO एक ऐसा विचार है जो 1970 के दशक में उभरा, जिसका उद्देश्य वैश्विक आर्थिक असमानताओं को कम करना था।
- यह मुख्य रूप से विकासशील देशों के हितों की रक्षा और उनके आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने पर आधारित था।
- NIEO की प्राथमिकताएँ:
- व्यापार में न्यायसंगतता।
- संसाधनों का समान वितरण।
- तकनीकी हस्तांतरण।
- वित्तीय और आर्थिक सहयोग।
SAARC (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन)
- स्थापना: 8 दिसंबर 1985।
- सदस्य देश: भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, और अफगानिस्तान।
- मुख्य उद्देश्य: दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देना।
SAARC की भूमिका:
- क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग:
- SAARC के सदस्य देशों के बीच व्यापार बढ़ाने और आर्थिक असमानताओं को कम करने का प्रयास।
- SAFTA (South Asian Free Trade Area) के माध्यम से व्यापार बाधाओं को कम करना।
- संसाधन साझा करना:
- ऊर्जा, जल संसाधन, और कृषि क्षेत्र में सहयोग।
- गरीबी उन्मूलन:
- संयुक्त परियोजनाएँ और नीतियाँ।
- NIEO में योगदान:
- दक्षिण एशिया के देशों की आवाज को वैश्विक मंच पर मजबूत करना।
- WTO और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर साझा दृष्टिकोण।
- चुनौतियाँ:
- सदस्य देशों के बीच राजनीतिक तनाव (भारत-पाकिस्तान)।
- सीमित आर्थिक सहयोग।
ASEAN (दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ)
- स्थापना: 8 अगस्त 1967।
- सदस्य देश: इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, ब्रुनेई, वियतनाम, लाओस, म्यांमार, और कंबोडिया।
- मुख्य उद्देश्य:
- दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक सहयोग को बढ़ावा देना।
- क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक विकास सुनिश्चित करना।
ASEAN की भूमिका:
- क्षेत्रीय आर्थिक विकास:
- ASEAN ने एकीकृत आर्थिक ढाँचा तैयार किया, जैसे ASEAN Free Trade Area (AFTA)।
- क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देने और बाधाओं को कम करने के प्रयास।
- वैश्विक व्यापार में भागीदारी:
- NIEO के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए विकसित देशों के साथ साझेदारी।
- मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से विकासशील देशों के लिए नए बाजार।
- NIEO के लिए योगदान:
- ASEAN की पहलें विकासशील देशों की आवाज को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करती हैं।
- विकसित देशों पर तकनीकी और वित्तीय सहयोग के लिए दबाव बनाना।
- संसाधन प्रबंधन:
- प्राकृतिक संसाधनों का सतत विकास और साझेदारी।
- चुनौतियाँ:
- सदस्य देशों के बीच आर्थिक असमानता।
- चीन और अमेरिका जैसे देशों के प्रभाव के कारण संतुलन बनाए रखना।
SAARC और ASEAN की तुलना
| पहलू | SAARC | ASEAN |
|---|---|---|
| स्थापना | 1985 | 1967 |
| सदस्य देश | 8 सदस्य (दक्षिण एशिया) | 10 सदस्य (दक्षिण-पूर्व एशिया) |
| मुख्य उद्देश्य | आर्थिक और सामाजिक विकास | आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता |
| अंतर्राष्ट्रीय योगदान | NIEO के लिए सामूहिक आवाज | वैश्विक व्यापार में सक्रिय भूमिका |
| चुनौतियाँ | राजनीतिक तनाव, सीमित सहयोग | बाहरी शक्तियों का प्रभाव |
SAARC और ASEAN का NIEO में योगदान
- NIEO के उद्देश्यों का समर्थन:
- दोनों संगठनों ने विकासशील देशों के लिए वैश्विक आर्थिक प्रणाली में न्यायसंगतता की माँग की।
- क्षेत्रीय एकीकरण:
- क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देकर वैश्विक स्तर पर विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करना।
- आर्थिक और तकनीकी सहयोग:
- विकसित देशों से तकनीकी और वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए संयुक्त प्रयास।
- वैश्विक मंच पर भागीदारी:
- WTO, UN और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विकासशील देशों की नीतियों को पेश करना।
भविष्य के लिए सुझाव और संभावनाएँ
- सदस्य देशों के बीच एकजुटता: आंतरिक विवादों को हल करके क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना।
- प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग: पर्यावरण के अनुकूल विकास रणनीतियाँ अपनाना।
- NIEO के उद्देश्यों का विस्तार: नए व्यापार और निवेश अवसरों की खोज।
- वैश्विक साझेदारी: विकसित देशों के साथ संतुलित सहयोग।