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/Political Geography/Unit IV
Political GeographyChapter Unit

अविकसितता और अंतर्राष्ट्रीय नीतियाँ

1. अविकसितता का अर्थ

  • अविकसितता वह स्थिति है जब कोई देश आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी रूप से विकसित देशों की तुलना में पिछड़ा होता है।
  • इसमें निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं:
    • आर्थिक असमानता
    • संसाधनों की कमी
    • तकनीकी और औद्योगिक पिछड़ापन
    • उच्च बेरोजगारी दर
    • गरीब जीवन स्तर

2. अविकसितता के कारण

  • औपनिवेशिक इतिहास: कई देशों को उनके प्राकृतिक संसाधनों और श्रम का शोषण कर आर्थिक रूप से कमजोर किया गया।
  • प्राकृतिक संसाधनों की कमी: कई देशों में खनिज और ऊर्जा स्रोतों की कमी है।
  • तकनीकी ज्ञान का अभाव: नई तकनीकों की कमी के कारण उत्पादन और निर्यात सीमित रहता है।
  • राजनीतिक अस्थिरता: स्थिर सरकारों की कमी से विकास बाधित होता है।
  • आर्थिक नीतियों की असफलता: अनियमित और अक्षम नीतियाँ आर्थिक विकास को रोकती हैं।

3. अंतर्राष्ट्रीय नीतियाँ और उनका प्रभाव

  • अंतर्राष्ट्रीय नीतियाँ अविकसित देशों पर निम्नलिखित तरीकों से प्रभाव डालती हैं:
    • ऋण और अनुदान: विकासशील देशों को सहायता प्रदान करने की नीतियाँ।
    • व्यापार नीति: विकसित देशों के साथ असंतुलित व्यापार से अविकसित देश और अधिक कमजोर होते हैं।
    • संयुक्त राष्ट्र और अन्य संस्थाएँ: विकासशील देशों की सहायता के लिए योजनाएँ और कार्यक्रम।
    • बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ: ये कंपनियाँ अक्सर अविकसित देशों में सस्ते श्रम का लाभ उठाती हैं।

4. अंतर्राष्ट्रीय नीतियों के सुधार के उपाय

  • समानता पर आधारित व्यापार: व्यापार नीतियों में निष्पक्षता।
  • विकास परियोजनाओं में निवेश: शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे में निवेश।
  • स्थानीय संसाधनों का उपयोग: स्थानीय तकनीक और श्रम को प्राथमिकता देना।
  • क्षेत्रीय सहयोग: अन्य विकासशील देशों के साथ सहयोग।

उत्तर-दक्षिण संवाद (North-South Dialogues)

उत्तर-दक्षिण संवाद का परिचय

  • उत्तर-दक्षिण संवाद का अर्थ है विकसित (उत्तर) और विकासशील/अविकसित (दक्षिण) देशों के बीच संवाद।
  • यह संवाद मुख्य रूप से आर्थिक असमानताओं को कम करने, संसाधनों के न्यायसंगत वितरण और एक नया अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order - NIEO) स्थापित करने पर केंद्रित है।
  • यह 1970 के दशक में उभरा, जब विकासशील देशों ने अपने अधिकारों और आवश्यकताओं के लिए संगठित तरीके से आवाज उठाई।

उत्तर और दक्षिण देशों का वर्गीकरण

  • उत्तर (Developed Nations)
    • विकसित और औद्योगिक रूप से समृद्ध देश।
    • उदाहरण: अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस।
    • विशेषताएँ: उच्च जीवन स्तर, उन्नत तकनीक, मजबूत अर्थव्यवस्था।
  • दक्षिण (Developing/Underdeveloped Nations)
    • विकासशील और अविकसित देश।
    • उदाहरण: भारत, अफ्रीका के देश, लातिन अमेरिका के देश।
    • विशेषताएँ: निम्न जीवन स्तर, प्राकृतिक संसाधनों का शोषण, तकनीकी और औद्योगिक पिछड़ापन।

उत्तर-दक्षिण संवाद की पृष्ठभूमि

  • औपनिवेशिक काल के दौरान दक्षिण के देशों के प्राकृतिक संसाधनों का उत्तर के देशों द्वारा शोषण किया गया।
  • विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि आधारित थी, जबकि विकसित देशों ने औद्योगिकीकरण को अपनाया।
  • 20वीं शताब्दी के मध्य में, विकासशील देशों ने वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपनी भागीदारी बढ़ाने की माँग की।
  • दक्षिण के देशों ने NIEO के तहत अपनी माँगें प्रस्तुत कीं, जैसे:
    • व्यापार में न्यायसंगतता।
    • कच्चे माल की कीमतों में स्थिरता।
    • तकनीकी और वित्तीय सहायता।

मुख्य मुद्दे और मांगें

  • संसाधनों का समान वितरण: प्राकृतिक संसाधनों पर विकासशील देशों का अधिकार।
  • आर्थिक सहयोग: व्यापारिक असमानताओं को समाप्त करना।
  • तकनीकी हस्तांतरण: विकसित देशों से तकनीक साझा करना।
  • वित्तीय सहायता: ऋण राहत और आर्थिक अनुदान।
  • ग्लोबल गवर्नेंस में भागीदारी: अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाना।

उत्तर-दक्षिण संवाद की प्रक्रिया

  • संयुक्त राष्ट्र का योगदान:
    • UNCTAD (United Nations Conference on Trade and Development) की स्थापना।
    • NIEO की पहल।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM): विकासशील देशों की आवाज को मजबूती प्रदान करना।
  • दक्षिण-दक्षिण सहयोग: विकासशील देशों के बीच सहयोग बढ़ाना।

उत्तर-दक्षिण संवाद के प्रभाव

  • कुछ महत्वपूर्ण सुधार हुए, जैसे:
    • वित्तीय संस्थानों (IMF, World Bank) द्वारा ऋण और सहायता।
    • दक्षिण देशों की मांगों पर चर्चा।
  • हालांकि, विकसित देशों का प्रभुत्व और असमानताओं का पूर्ण समाधान नहीं हुआ।

उत्तर-दक्षिण संवाद की चुनौतियाँ

  • राजनीतिक असमानता: विकासशील देशों की आवाज कमजोर रही।
  • आर्थिक प्रभुत्व: विकसित देशों की नीतियों का दबदबा।
  • सहमति की कमी: विकासशील देशों के बीच विचारों की असमानता।
  • वित्तीय संकट: वैश्विक आर्थिक अस्थिरता का प्रभाव।

आगे का रास्ता

  • समानता आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रणाली।
  • विकासशील देशों को प्रौद्योगिकी और वित्तीय सहायता।
  • ग्रीन एनर्जी और सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर सहयोग।
  • वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया।

नए अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order - NIEO) में SAARC और ASEAN की भूमिका

नए अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) का परिचय

  • NIEO एक ऐसा विचार है जो 1970 के दशक में उभरा, जिसका उद्देश्य वैश्विक आर्थिक असमानताओं को कम करना था।
  • यह मुख्य रूप से विकासशील देशों के हितों की रक्षा और उनके आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने पर आधारित था।
  • NIEO की प्राथमिकताएँ:
    • व्यापार में न्यायसंगतता।
    • संसाधनों का समान वितरण।
    • तकनीकी हस्तांतरण।
    • वित्तीय और आर्थिक सहयोग।

SAARC (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन)

  • स्थापना: 8 दिसंबर 1985।
  • सदस्य देश: भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, और अफगानिस्तान।
  • मुख्य उद्देश्य: दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देना।
SAARC की भूमिका:
  1. क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग:
    • SAARC के सदस्य देशों के बीच व्यापार बढ़ाने और आर्थिक असमानताओं को कम करने का प्रयास।
    • SAFTA (South Asian Free Trade Area) के माध्यम से व्यापार बाधाओं को कम करना।
  2. संसाधन साझा करना:
    • ऊर्जा, जल संसाधन, और कृषि क्षेत्र में सहयोग।
  3. गरीबी उन्मूलन:
    • संयुक्त परियोजनाएँ और नीतियाँ।
  4. NIEO में योगदान:
    • दक्षिण एशिया के देशों की आवाज को वैश्विक मंच पर मजबूत करना।
    • WTO और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर साझा दृष्टिकोण।
  5. चुनौतियाँ:
    • सदस्य देशों के बीच राजनीतिक तनाव (भारत-पाकिस्तान)।
    • सीमित आर्थिक सहयोग।

ASEAN (दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ)

  • स्थापना: 8 अगस्त 1967।
  • सदस्य देश: इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, ब्रुनेई, वियतनाम, लाओस, म्यांमार, और कंबोडिया।
  • मुख्य उद्देश्य:
    • दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक सहयोग को बढ़ावा देना।
    • क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक विकास सुनिश्चित करना।
ASEAN की भूमिका:
  1. क्षेत्रीय आर्थिक विकास:
    • ASEAN ने एकीकृत आर्थिक ढाँचा तैयार किया, जैसे ASEAN Free Trade Area (AFTA)।
    • क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देने और बाधाओं को कम करने के प्रयास।
  2. वैश्विक व्यापार में भागीदारी:
    • NIEO के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए विकसित देशों के साथ साझेदारी।
    • मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से विकासशील देशों के लिए नए बाजार।
  3. NIEO के लिए योगदान:
    • ASEAN की पहलें विकासशील देशों की आवाज को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करती हैं।
    • विकसित देशों पर तकनीकी और वित्तीय सहयोग के लिए दबाव बनाना।
  4. संसाधन प्रबंधन:
    • प्राकृतिक संसाधनों का सतत विकास और साझेदारी।
  5. चुनौतियाँ:
    • सदस्य देशों के बीच आर्थिक असमानता।
    • चीन और अमेरिका जैसे देशों के प्रभाव के कारण संतुलन बनाए रखना।

SAARC और ASEAN की तुलना

पहलूSAARCASEAN
स्थापना19851967
सदस्य देश8 सदस्य (दक्षिण एशिया)10 सदस्य (दक्षिण-पूर्व एशिया)
मुख्य उद्देश्यआर्थिक और सामाजिक विकासआर्थिक और राजनीतिक स्थिरता
अंतर्राष्ट्रीय योगदानNIEO के लिए सामूहिक आवाजवैश्विक व्यापार में सक्रिय भूमिका
चुनौतियाँराजनीतिक तनाव, सीमित सहयोगबाहरी शक्तियों का प्रभाव

SAARC और ASEAN का NIEO में योगदान

  • NIEO के उद्देश्यों का समर्थन:
    • दोनों संगठनों ने विकासशील देशों के लिए वैश्विक आर्थिक प्रणाली में न्यायसंगतता की माँग की।
  • क्षेत्रीय एकीकरण:
    • क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देकर वैश्विक स्तर पर विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करना।
  • आर्थिक और तकनीकी सहयोग:
    • विकसित देशों से तकनीकी और वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए संयुक्त प्रयास।
  • वैश्विक मंच पर भागीदारी:
    • WTO, UN और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विकासशील देशों की नीतियों को पेश करना।

भविष्य के लिए सुझाव और संभावनाएँ

  • सदस्य देशों के बीच एकजुटता: आंतरिक विवादों को हल करके क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना।
  • प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग: पर्यावरण के अनुकूल विकास रणनीतियाँ अपनाना।
  • NIEO के उद्देश्यों का विस्तार: नए व्यापार और निवेश अवसरों की खोज।
  • वैश्विक साझेदारी: विकसित देशों के साथ संतुलित सहयोग।

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