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/Physical Geography/Unit IV
Physical GeographyChapter Unit

सागरीय तल (Ocean Bottoms)

सागरीय तल, जिसे महासागरीय तल भी कहा जाता है, पृथ्वी की सतह का वह भाग है जो समुद्र और महासागरों के नीचे स्थित होता है। यह भूगर्भीय संरचना, जैव विविधता और समुद्री संसाधनों के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण है। आइए इसे विस्तार से समझें:


1. सागरीय तल की परिभाषा और महत्व

सागरीय तल पृथ्वी की पर्पटी (क्रस्ट) का वह भाग है जो समुद्र के पानी से ढका हुआ है। यह भू-आकृतियों, संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्रों का एक जटिल संयोजन है।
महत्व:

  • भूगर्भीय अध्ययन: यह पृथ्वी की प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) को समझने में सहायक है।
  • संसाधन: इसमें तेल, प्राकृतिक गैस, खनिज और जैविक संसाधन पाए जाते हैं।
  • जैव विविधता: सागरीय तल पर विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु पाए जाते हैं।
  • पारिस्थितिकी तंत्र: यह समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2. सागरीय तल की संरचना

सागरीय तल को चार प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है:

(i) महाद्वीपीय शेल्फ (Continental Shelf)
  • यह समुद्र के किनारे का उथला भाग है।
  • इसकी गहराई आमतौर पर 200 मीटर तक होती है।
  • यह जैव विविधता और समुद्री संसाधनों से समृद्ध होता है।
  • यहाँ मछली पकड़ने और तेल-गैस के दोहन जैसे आर्थिक गतिविधियाँ होती हैं।
(ii) महाद्वीपीय ढाल (Continental Slope)
  • यह महाद्वीपीय शेल्फ के बाद का खड़ी ढलान वाला भाग है।
  • इसकी गहराई 200 मीटर से 2000 मीटर तक होती है।
  • यहाँ तलछट जमा होती है।
(iii) गहरे समुद्री मैदान (Abyssal Plain)
  • यह समुद्र तल का समतल और गहरा भाग है।
  • इसकी गहराई 3000 से 6000 मीटर तक होती है।
  • यह तलछटी चट्टानों से ढका होता है।
(iv) महासागरीय गर्त (Oceanic Trenches)
  • ये महासागरों के सबसे गहरे भाग होते हैं।
  • उदाहरण: मारियाना गर्त, जिसकी गहराई लगभग 11,034 मीटर है।
  • ये सबडक्शन जोन के कारण बनते हैं।

3. सागरीय तल की आकृति विज्ञान

(i) समुद्री पर्वत (Seamounts)
  • ये ज्वालामुखीय पर्वत हैं जो समुद्र तल से ऊपर उठे होते हैं।
  • यदि ये समुद्र की सतह तक पहुँच जाते हैं तो द्वीप बन जाते हैं।
(ii) समुद्री मैदान (Oceanic Ridges)
  • ये महासागरों के बीच स्थित पर्वतीय शृंखलाएँ हैं।
  • उदाहरण: मिड-अटलांटिक रिज।
(iii) समुद्री दरारें (Rift Valleys)
  • ये महासागरीय रिज के बीच की दरारें होती हैं।
  • इनसे मैग्मा बाहर निकलकर नई पर्पटी बनाता है।

4. सागरीय तल का भूगर्भीय महत्व

(i) प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics)
  • सागरीय तल पर प्लेटों का संचलन होता है, जिससे भूकंप, ज्वालामुखी और पर्वतीय निर्माण जैसी प्रक्रियाएँ होती हैं।
  • महासागरीय गर्त और रिज इस प्रक्रिया के प्रमुख भाग हैं।
(ii) जैव विविधता
  • सागरीय तल पर कोरल रीफ, हाइड्रोथर्मल वेंट्स और गहरे समुद्री क्षेत्र जैसी जैविक संरचनाएँ मिलती हैं।

5. सागरीय तल के अध्ययन के तरीके

(i) सोनार तकनीक (SONAR Technology)
  • यह ध्वनि तरंगों का उपयोग करके समुद्र की गहराई और तल की संरचना का पता लगाने की तकनीक है।
(ii) उपग्रह इमेजरी (Satellite Imagery)
  • उपग्रहों का उपयोग समुद्री क्षेत्र की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
(iii) समुद्री सर्वेक्षण (Marine Surveys)
  • समुद्री सर्वेक्षण जहाजों द्वारा किया जाता है।
  • इसमें समुद्री तलछट, खनिज, और पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन शामिल है।

महासागर जल का तापमान और लवणता (Temperature of Ocean Water and Salinity)

महासागर जल का तापमान और लवणता समुद्र विज्ञान के दो महत्वपूर्ण घटक हैं। यह जलवायु, महासागरीय धाराओं, और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करते हैं। आइए इसे विस्तार से समझें:


1. महासागर जल का तापमान (Temperature of Ocean Water)

(i) परिभाषा और महत्व

महासागर जल का तापमान, समुद्र के सतह और गहराई पर जल के तापीय स्तर को दर्शाता है। यह पृथ्वी की जलवायु, मानसून, और समुद्री धाराओं को नियंत्रित करता है।

(ii) तापमान के वितरण के कारक

महासागर जल का तापमान विभिन्न कारणों से प्रभावित होता है:

  1. अक्षांश (Latitude)

    • भूमध्य रेखा के निकट महासागर का तापमान अधिक होता है (लगभग 25°C से 30°C)।
    • ध्रुवीय क्षेत्रों में यह तापमान बहुत कम होता है (लगभग -2°C)।
  2. गहराई (Depth)

    • सतही जल गर्म होता है क्योंकि यह सूर्य की किरणों को अवशोषित करता है।
    • गहराई बढ़ने के साथ तापमान कम हो जाता है।
  3. समुद्री धाराएँ (Ocean Currents)

    • गर्म धाराएँ (जैसे गल्फ स्ट्रीम) तापमान बढ़ाती हैं।
    • ठंडी धाराएँ (जैसे कनारी धारा) तापमान को कम करती हैं।
  4. ऋतुएँ (Seasons)

    • गर्मियों में महासागर का तापमान अधिक होता है।
    • सर्दियों में तापमान कम हो जाता है।
  5. तटरेखा की संरचना (Coastal Topography)

    • उथले तटों पर पानी अधिक गर्म होता है।
    • गहरे क्षेत्रों में पानी ठंडा रहता है।

(iii) तापमान का ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Distribution of Temperature)

  1. सतही परत (Surface Layer)

    • यह परत 0 से 200 मीटर तक होती है।
    • यहाँ तापमान सबसे अधिक होता है।
  2. थर्मोक्लाइन परत (Thermocline Layer)

    • यह 200 से 1000 मीटर तक होती है।
    • इस परत में तापमान तेजी से गिरता है।
  3. गहरी परत (Deep Layer)

    • यह 1000 मीटर से अधिक गहराई पर होती है।
    • यहाँ तापमान स्थिर और ठंडा होता है (लगभग 0°C से 3°C)।

2. महासागर जल की लवणता (Salinity of Ocean Water)

(i) परिभाषा और महत्व

लवणता समुद्र के पानी में घुले हुए खनिज लवणों की मात्रा को दर्शाती है। यह प्रति किलोग्राम पानी में घुले लवणों को ग्राम में मापा जाता है और इसे "प्रमिल" (‰) में व्यक्त किया जाता है। सामान्यतः महासागरीय जल की औसत लवणता 35‰ होती है।

(ii) लवणता को प्रभावित करने वाले कारक

  1. वाष्पीकरण (Evaporation)

    • उच्च वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों में लवणता अधिक होती है।
    • जैसे: उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में।
  2. वर्षा (Precipitation)

    • अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में लवणता कम होती है।
    • जैसे: विषुवतीय क्षेत्रों में।
  3. नदियों का प्रवाह (River Inflow)

    • नदियों से ताजा पानी मिलने के कारण लवणता कम हो जाती है।
    • जैसे: बंगाल की खाड़ी।
  4. हिमनद पिघलना (Melting of Glaciers)

    • हिमनद पिघलने से लवणता कम हो जाती है।
    • जैसे: ध्रुवीय क्षेत्रों में।
  5. समुद्री धाराएँ (Ocean Currents)

    • ठंडी धाराएँ लवणता को कम करती हैं।
    • गर्म धाराएँ लवणता को बढ़ा सकती हैं।

(iii) लवणता का वितरण

  1. क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution)

    • उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र: लवणता अधिक (36‰ से अधिक)।
    • ध्रुवीय क्षेत्र: लवणता कम (32‰ से कम)।
  2. ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Distribution)

    • सतही जल की लवणता अधिक होती है।
    • गहराई के साथ लवणता कम हो जाती है।

(iv) महासागर की प्रमुख लवणता क्षेत्र

  • उच्च लवणता क्षेत्र: लाल सागर (41‰), फारस की खाड़ी।
  • कम लवणता क्षेत्र: आर्कटिक महासागर, बंगाल की खाड़ी।

3. महासागर जल के तापमान और लवणता के प्रभाव

  1. समुद्री धाराओं पर प्रभाव

    • तापमान और लवणता का अंतर महासागरीय धाराओं को प्रभावित करता है।
  2. जलवायु पर प्रभाव

    • समुद्री सतह का तापमान मानसून और जलवायु पैटर्न को नियंत्रित करता है।
  3. समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव

    • तापमान और लवणता समुद्री जीवों की विविधता और वितरण को प्रभावित करते हैं।
  4. घनत्व और परतबद्धता

    • लवणता और तापमान घनत्व को प्रभावित करते हैं, जो महासागर की परतबद्धता (Stratification) को नियंत्रित करता है।

महासागरीय धाराएँ और ज्वार-भाटा (Currents and Tides)

महासागरीय धाराएँ और ज्वार-भाटा महासागरों की गतिशीलता और पृथ्वी की जलवायु प्रणाली के महत्वपूर्ण अंग हैं। ये महासागरीय जल की गति और उसके प्रभाव को दर्शाते हैं। आइए इसे विस्तार से समझें:


1. महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents)

(i) परिभाषा

महासागरीय धाराएँ पानी के बड़े और निरंतर प्रवाह को दर्शाती हैं, जो विशेष दिशा में चलता है। ये सतही और गहरी धाराओं के रूप में वर्गीकृत होती हैं।


(ii) महासागरीय धाराओं के प्रकार

  1. सतही धाराएँ (Surface Currents)

    • ये महासागरों के ऊपरी 400 मीटर तक चलती हैं।
    • वायुमंडलीय हवा, पृथ्वी का घूर्णन और महासागरीय तापमान इनको प्रभावित करते हैं।
    • उदाहरण: गल्फ स्ट्रीम, कनारी धारा।
  2. गहरी धाराएँ (Deep Currents)

    • ये महासागर की गहराई में चलती हैं।
    • घनत्व, लवणता और तापमान के कारण बनती हैं।
    • थर्मोहेलाइन परिसंचरण (Thermohaline Circulation) के अंतर्गत आती हैं।

(iii) महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले कारक

  1. पवन (Wind)

    • व्यापारिक हवाएँ (Trade Winds) और पछुआ हवाएँ (Westerlies) सतही धाराओं को प्रभावित करती हैं।
  2. पृथ्वी का घूर्णन (Earth's Rotation)

    • कोरिओलिस प्रभाव के कारण धाराएँ उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर और दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़ती हैं।
  3. तापमान और लवणता (Temperature and Salinity)

    • गर्म पानी हल्का होता है और ठंडा पानी भारी, जिससे घनत्व आधारित धाराएँ बनती हैं।
  4. महाद्वीपीय तटरेखा (Continental Coastlines)

    • तटरेखा धाराओं की दिशा को प्रभावित करती है।

(iv) महासागरीय धाराओं के उदाहरण

  1. गर्म धाराएँ (Warm Currents)

    • ये भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर गर्म पानी ले जाती हैं।
    • उदाहरण: गल्फ स्ट्रीम (अटलांटिक महासागर), कुरोशियो धारा (प्रशांत महासागर)।
  2. ठंडी धाराएँ (Cold Currents)

    • ये ध्रुवीय क्षेत्रों से भूमध्य रेखा की ओर ठंडा पानी लाती हैं।
    • उदाहरण: कनारी धारा (अटलांटिक महासागर), ओयाशियो धारा (प्रशांत महासागर)।

(v) महासागरीय धाराओं के प्रभाव

  1. जलवायु पर प्रभाव

    • गर्म धाराएँ तटीय क्षेत्रों को गर्म बनाती हैं।
    • ठंडी धाराएँ तटीय क्षेत्रों को ठंडा करती हैं।
  2. समुद्री परिवहन

    • धाराएँ समुद्री यात्रा को सरल बनाती हैं।
  3. मत्स्य उद्योग (Fisheries)

    • ठंडी धाराओं वाले क्षेत्र मछलियों की प्रचुरता के लिए प्रसिद्ध हैं।
  4. मानसून और चक्रवात

    • महासागरीय धाराएँ जलवायु चक्र को प्रभावित करती हैं।

2. ज्वार-भाटा (Tides)

(i) परिभाषा

ज्वार-भाटा महासागरीय जल का नियमित रूप से ऊपर उठना और गिरना है, जो चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल और पृथ्वी के घूर्णन के कारण होता है।


(ii) ज्वार-भाटा के प्रकार

  1. उच्च ज्वार (High Tide)

    • जब समुद्र का जल स्तर ऊपर उठता है।
  2. निम्न ज्वार (Low Tide)

    • जब समुद्र का जल स्तर गिरता है।
  3. स्प्रिंग टाइड (Spring Tide)

    • जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी एक सीध में होते हैं।
    • जल स्तर में अत्यधिक वृद्धि होती है।
  4. नीप टाइड (Neap Tide)

    • जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी समकोण पर होते हैं।
    • जल स्तर में कम वृद्धि होती है।

(iii) ज्वार-भाटा को प्रभावित करने वाले कारक

  1. चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल

    • चंद्रमा का प्रभाव सूर्य से अधिक होता है।
  2. पृथ्वी का घूर्णन

    • पृथ्वी का घूर्णन ज्वार-भाटा के समय और आवृत्ति को प्रभावित करता है।
  3. तटरेखा का आकार (Shape of Coastline)

    • खाड़ी और नदी के मुहाने पर ज्वार अधिक होता है।
  4. समुद्र की गहराई और तल का आकार

    • उथले क्षेत्रों में ज्वार अधिक प्रभावी होता है।

(iv) ज्वार-भाटा के प्रभाव

  1. समुद्री परिवहन

    • बंदरगाहों पर ज्वार-भाटा के समय जहाजों का संचालन होता है।
  2. मत्स्य पालन

    • मछलियों के प्रवास पर ज्वार-भाटा का प्रभाव पड़ता है।
  3. ऊर्जा उत्पादन

    • ज्वार-भाटा ऊर्जा का एक स्रोत है।
    • उदाहरण: पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में ज्वारीय ऊर्जा परियोजना।
  4. तटीय क्षेत्रों पर प्रभाव

    • ज्वार-भाटा तटीय क्षरण और निर्माण को प्रभावित करता है।

महासागरीय जमा (Ocean Deposits)

महासागरीय जमा (Ocean Deposits) महासागर के तल पर पाई जाने वाली वह सामग्री है, जो समुद्री प्रक्रियाओं, जैविक गतिविधियों, और भू-आकृतिक कारकों के परिणामस्वरूप इकट्ठा होती है। यह तलछट महासागरीय पारिस्थितिकी और भूविज्ञान को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आइए इसे विस्तार से समझें:


1. महासागरीय जमा की परिभाषा और महत्व

(i) परिभाषा

महासागरीय जमा उन खनिज, जैविक और रासायनिक पदार्थों का संग्रह है, जो समुद्र तल पर धीरे-धीरे जमते हैं। ये पदार्थ महासागर में विभिन्न स्रोतों से आते हैं।

(ii) महत्व

  • महासागरीय तल की संरचना को समझने में मदद करता है।
  • खनिज संसाधनों का पता लगाने के लिए उपयोगी है।
  • पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास और जलवायु परिवर्तन को समझने में सहायक।
  • जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन।

2. महासागरीय जमा के प्रकार

महासागरीय जमा को उनके स्रोत और संरचना के आधार पर तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

(i) पेलजिक जमा (Pelagic Deposits)

  • ये महासागर के गहरे क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
  • इनमें मुख्यतः महीन कण और सूक्ष्म जीवों के अवशेष होते हैं।
  • उदाहरण: रेड क्ले (Red Clay), सिलिकीयस ओज (Siliceous Ooze)।

(ii) टेरेजिनस जमा (Terrigenous Deposits)

  • ये मुख्यतः महाद्वीपीय क्षेत्रों से नदी, हवा, और ग्लेशियरों के माध्यम से महासागरों में लाई जाती हैं।
  • इनमें मिट्टी, रेत, और चट्टानों के कण शामिल होते हैं।
  • उदाहरण: रेत, गाद, और कंकड़।

(iii) बायोजेनिक जमा (Biogenic Deposits)

  • ये जैविक स्रोतों जैसे मृत जीवों, प्रवाल (Corals), और सूक्ष्मजीवों के अवशेषों से बनते हैं।
  • उदाहरण: कैल्शियम कार्बोनेट और सिलिका के निक्षेप।

(iv) हाइड्रोजेनस जमा (Hydrogenous Deposits)

  • ये समुद्र के जल में घुले हुए खनिजों के रासायनिक निक्षेपण से बनते हैं।
  • उदाहरण: मैंगनीज नोड्यूल्स (Manganese Nodules), फॉस्फोराइट्स।

3. महासागरीय जमा को प्रभावित करने वाले कारक

(i) भौगोलिक स्थान (Geographical Location)

  • उथले तटीय क्षेत्रों में टेरेजिनस जमा प्रमुख होते हैं।
  • गहरे महासागर में पेलजिक जमा अधिक पाए जाते हैं।

(ii) समुद्री धाराएँ (Ocean Currents)

  • महासागरीय धाराएँ तलछट के परिवहन और जमाव को नियंत्रित करती हैं।

(iii) जैविक गतिविधियाँ (Biological Activities)

  • मृत जीवों के अवशेष बायोजेनिक जमाव का निर्माण करते हैं।

(iv) गहराई (Depth)

  • गहराई के अनुसार जमा की प्रकृति बदलती है।

4. महासागरीय जमा के उदाहरण और उनका वितरण

(i) रेड क्ले (Red Clay)

  • यह गहरे महासागर के तल पर पाया जाता है।
  • यह आयरन और सिलिका से समृद्ध होता है।

(ii) मैंगनीज नोड्यूल्स (Manganese Nodules)

  • यह समुद्र के तल पर बनने वाले धातु के गोले हैं।
  • इनमें मैंगनीज, आयरन, और अन्य धातुएँ होती हैं।

(iii) कैल्शियम कार्बोनेट निक्षेप (Calcareous Deposits)

  • मुख्यतः उथले क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
  • ये सूक्ष्मजीवों के अवशेषों से बनती हैं।

(iv) सिलिकीयस ओज (Siliceous Ooze)

  • यह सिलिका-आधारित सूक्ष्मजीवों के अवशेषों से बनता है।
  • यह गहरे महासागर में पाया जाता है।

5. महासागरीय जमा के उपयोग

(i) खनिज संसाधन

  • मैंगनीज नोड्यूल्स, फॉस्फोराइट्स और अन्य खनिज महासागरों से निकाले जाते हैं।

(ii) जैव विविधता का अध्ययन

  • बायोजेनिक जमा से समुद्री जीवों के विकास और पारिस्थितिकी तंत्र को समझा जा सकता है।

(iii) भूगर्भीय अध्ययन

  • महासागरीय जमा पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास और जलवायु परिवर्तन के प्रमाण प्रदान करती हैं।

6. महासागरीय जमा का अध्ययन

(i) समुद्री सर्वेक्षण (Marine Surveys)

  • महासागरीय जमा का अध्ययन करने के लिए समुद्री सर्वेक्षण किया जाता है।

(ii) ड्रिलिंग तकनीक (Drilling Technique)

  • गहरे महासागर के तल से तलछट के नमूने लेने के लिए ड्रिलिंग तकनीक का उपयोग किया जाता है।

(iii) सोनार और उपग्रह तकनीक (Sonar and Satellite Technology)

  • महासागरीय जमा का स्थान और वितरण समझने में सहायक।

प्रवाल और एटोल्स (Corals and Atolls)

प्रवाल (Corals) और एटोल्स (Atolls) समुद्र के अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र और भू-आकृतियों के महत्वपूर्ण घटक हैं। ये न केवल जैव विविधता का केंद्र हैं, बल्कि समुद्री भूविज्ञान और पर्यावरणीय अध्ययन के लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। आइए इन्हें विस्तार से समझें:


1. प्रवाल (Corals)

(i) परिभाषा

प्रवाल समुद्री सूक्ष्मजीवों (पॉलीप्स) द्वारा निर्मित चूनेदार संरचनाएँ (Calcium Carbonate Structures) हैं। ये उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय महासागरों में पाए जाते हैं।


(ii) प्रवाल के प्रकार

  1. सख्त प्रवाल (Hard Corals)

    • चूना पत्थर (Calcium Carbonate) से निर्मित।
    • प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) का निर्माण करते हैं।
    • उदाहरण: स्टार कॉरल, एल्कहोर्न कॉरल।
  2. मुलायम प्रवाल (Soft Corals)

    • चूनेदार संरचना के बिना लचीले होते हैं।
    • समुद्री पंख (Sea Fans) और समुद्री पंखुडियों (Sea Whips) का निर्माण करते हैं।

(iii) प्रवाल की जीवन परिस्थितियाँ

  1. तापमान

    • 20°C से 30°C तक का तापमान उपयुक्त है।
    • ठंडे क्षेत्रों में प्रवाल नहीं पाए जाते।
  2. गहराई

    • 50 मीटर तक की गहराई में पनपते हैं, जहाँ सूर्य की रोशनी पहुँच सके।
  3. लवणता

    • 32‰ से 40‰ लवणता वाले जल में प्रवाल पनपते हैं।
  4. शुद्ध जल

    • गाद और प्रदूषण रहित पानी प्रवाल के लिए अनिवार्य है।

(iv) प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs)

प्रवाल भित्तियाँ समुद्र के नीचे प्रवाल पॉलीप्स द्वारा निर्मित चट्टानों का समूह हैं।

(a) प्रवाल भित्तियों के प्रकार

  1. किनारी भित्ति (Fringing Reef)

    • तट के पास स्थित होती है।
    • उदाहरण: रेड सी में पाई जाने वाली भित्तियाँ।
  2. अवरोधक भित्ति (Barrier Reef)

    • तट से कुछ दूरी पर स्थित होती है।
    • उदाहरण: ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ।
  3. एटोल्स (Atolls)

    • गोलाकार या अर्धगोलाकार भित्तियाँ, जो किसी डूबे हुए ज्वालामुखी के चारों ओर बनती हैं।
    • इनमें केंद्र में पानी भरा होता है।

(v) प्रवाल का महत्व

  1. जैव विविधता का संरक्षण

    • प्रवाल भित्तियाँ समुद्री जीवों का आवास हैं।
    • इन्हें "समुद्री वर्षावन" भी कहा जाता है।
  2. तटों की रक्षा

    • ये तटीय क्षेत्रों को समुद्री कटाव और तूफानों से बचाती हैं।
  3. पर्यटन

    • प्रवाल पर्यटन स्थलों जैसे मालदीव और अंडमान द्वीपों का केंद्र हैं।
  4. औषधीय उपयोग

    • प्रवाल से नई दवाओं का विकास हो रहा है।

2. एटोल्स (Atolls)

(i) परिभाषा

एटोल्स गोलाकार प्रवाल भित्तियाँ हैं, जो किसी डूबे हुए ज्वालामुखी के चारों ओर बनती हैं। इनकी संरचना के बीच में पानी से भरी हुई एक लैगून (Lagoon) होती है।


(ii) एटोल्स के निर्माण का सिद्धांत

एटोल्स के निर्माण को समझाने के लिए चार्ल्स डार्विन ने "प्रवाल भित्ति विकास सिद्धांत" (Coral Reef Formation Theory) प्रस्तुत किया।

(a) सिद्धांत के चरण

  1. ज्वालामुखीय द्वीप चरण (Volcanic Island Stage)

    • एक सक्रिय ज्वालामुखी समुद्र तल से ऊपर उठता है।
    • इसके आसपास प्रवाल पॉलीप्स बसने लगते हैं।
  2. किनारी भित्ति चरण (Fringing Reef Stage)

    • प्रवाल द्वीप के चारों ओर किनारी भित्ति बनाते हैं।
  3. अवरोधक भित्ति चरण (Barrier Reef Stage)

    • ज्वालामुखी द्वीप धीरे-धीरे डूबने लगता है, और प्रवाल चारों ओर अवरोधक भित्ति बनाते हैं।
  4. एटोल चरण (Atoll Stage)

    • ज्वालामुखी पूरी तरह से डूब जाता है।
    • केवल प्रवाल भित्ति बचती है, जिसके बीच में लैगून होता है।

(iii) एटोल्स के उदाहरण

  1. मालदीव द्वीप समूह
    • दुनिया के सबसे सुंदर एटोल्स के लिए प्रसिद्ध।
  2. लक्षद्वीप
    • भारत में प्रमुख एटोल्स।
  3. मार्शल द्वीप समूह (Marshall Islands)

3. प्रवाल और एटोल्स को प्रभावित करने वाले कारक

  1. ग्लोबल वार्मिंग

    • तापमान में वृद्धि प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) का कारण बनती है।
  2. प्रदूषण

    • समुद्री प्रदूषण और तेल फैलाव प्रवाल को नष्ट कर सकते हैं।
  3. मानव गतिविधियाँ

    • मछली पकड़ने और निर्माण गतिविधियाँ प्रवाल और एटोल्स को नुकसान पहुँचाती हैं।
  4. समुद्र तल का बढ़ना

    • समुद्र तल के बढ़ने से एटोल्स के अस्तित्व को खतरा है।

4. प्रवाल और एटोल्स का संरक्षण

  1. समुद्री संरक्षित क्षेत्र (Marine Protected Areas)

    • प्रवाल भित्तियों और एटोल्स को संरक्षित करने के लिए।
  2. प्रवाल पुनर्स्थापना परियोजनाएँ (Coral Restoration Projects)

    • प्रवाल को पुनर्जीवित करने के लिए।
  3. प्रदूषण नियंत्रण

    • समुद्री प्रदूषण को रोकने के उपाय।
  4. स्थानीय समुदायों की भागीदारी

    • संरक्षण में स्थानीय समुदायों को शामिल करना।

बायोस्फियर और बायोम (Biosphere and Biome)

बायोस्फियर और बायोम पृथ्वी पर जीवन और उसके वितरण को समझने के लिए उपयोग किए जाने वाले महत्वपूर्ण भूगोलिक और पारिस्थितिकीय अवधारणाएँ हैं। ये दोनों अवधारणाएँ पारिस्थितिकी तंत्र के कामकाज और जैव विविधता को समझने में सहायक होती हैं। आइए इन्हें विस्तार से समझें:


1. बायोस्फियर (Biosphere)

(i) परिभाषा

बायोस्फियर पृथ्वी का वह भाग है जहाँ जीवन संभव है। इसमें भूमि, जल, और वायुमंडल का वह भाग शामिल है जहाँ जैविक क्रियाएँ होती हैं। यह पृथ्वी के सभी पारिस्थितिकी तंत्रों का संग्रह है।


(ii) बायोस्फियर के घटक

  1. भूमंडल (Lithosphere)

    • यह पृथ्वी की ठोस परत है।
    • इसमें मिट्टी, चट्टानें, और खनिज शामिल होते हैं।
  2. जलमंडल (Hydrosphere)

    • यह पृथ्वी का जल क्षेत्र है।
    • इसमें महासागर, नदियाँ, झीलें, और भूमिगत जल शामिल हैं।
  3. वायुमंडल (Atmosphere)

    • यह पृथ्वी को घेरने वाली गैसों की परत है।
    • इसमें ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें शामिल हैं।

(iii) बायोस्फियर का महत्व

  1. जीवन का आधार

    • यह पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक घटक प्रदान करता है।
  2. पारिस्थितिक संतुलन

    • यह जैविक और अजैविक घटकों के बीच संतुलन बनाए रखता है।
  3. प्राकृतिक संसाधन

    • बायोस्फियर भोजन, जल, ऊर्जा, और खनिज संसाधनों का स्रोत है।
  4. जलवायु नियमन

    • यह पृथ्वी के जलवायु चक्र को नियंत्रित करता है।

2. बायोम (Biome)

(i) परिभाषा

बायोम पृथ्वी पर पाई जाने वाली विशिष्ट भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों वाले बड़े पारिस्थितिकी तंत्र हैं। प्रत्येक बायोम में विशिष्ट प्रकार के पौधे, जानवर और जलवायु पाई जाती है।


(ii) बायोम के प्रकार

बायोम को मुख्यतः स्थलीय (Terrestrial) और जलीय (Aquatic) में विभाजित किया जाता है।

(a) स्थलीय बायोम (Terrestrial Biomes)

  1. उष्णकटिबंधीय वर्षावन (Tropical Rainforest)

    • स्थान: अमेज़न बेसिन, दक्षिण-पूर्व एशिया।
    • विशेषता: उच्च वर्षा, उच्च जैव विविधता।
    • उदाहरण: जगुआर, ऑर्किड।
  2. घास के मैदान (Grasslands)

    • स्थान: उत्तरी अमेरिका (प्रेयरीज), अफ्रीका (सवाना)।
    • विशेषता: मध्यम वर्षा, घास का प्रभुत्व।
    • उदाहरण: ज़ेब्रा, बाइसन।
  3. रेगिस्तान (Desert)

    • स्थान: सहारा, थार।
    • विशेषता: अत्यधिक शुष्कता, बहुत कम जैव विविधता।
    • उदाहरण: कैक्टस, ऊँट।
  4. टुंड्रा (Tundra)

    • स्थान: आर्कटिक क्षेत्र।
    • विशेषता: अत्यधिक ठंड, बर्फ से ढका।
    • उदाहरण: काई, ध्रुवीय भालू।
  5. शीतोष्ण वन (Temperate Forests)

    • स्थान: यूरोप, उत्तरी अमेरिका।
    • विशेषता: चार ऋतुओं का चक्र, मध्यम वर्षा।
    • उदाहरण: ओक, हिरण।

(b) जलीय बायोम (Aquatic Biomes)

  1. मीठे पानी का पारिस्थितिकी तंत्र (Freshwater Ecosystem)

    • स्थान: नदियाँ, झीलें।
    • उदाहरण: मछलियाँ, कछुए।
  2. समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (Marine Ecosystem)

    • स्थान: महासागर, प्रवाल भित्तियाँ।
    • उदाहरण: शार्क, प्रवाल।

(iii) बायोम का महत्व

  1. जैव विविधता का संरक्षण

    • प्रत्येक बायोम जैव विविधता का भंडार है।
  2. जलवायु पर प्रभाव

    • बायोम पृथ्वी के जलवायु चक्र को संतुलित करते हैं।
  3. आर्थिक महत्व

    • बायोम भोजन, लकड़ी, और औषधियों का स्रोत हैं।
  4. पारिस्थितिक सेवाएँ

    • ये पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्रदान करते हैं, जैसे कार्बन अवशोषण और जल चक्र।

3. बायोस्फियर और बायोम के बीच संबंध

  • बायोम बायोस्फियर के अंतर्गत आते हैं।
  • बायोस्फियर पृथ्वी पर जीवन के लिए सभी आवश्यक भौगोलिक और पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करता है।
  • बायोम बायोस्फियर के विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र हैं, जहाँ समान जलवायु, वनस्पति, और जीव-जंतु पाए जाते हैं।

4. संरक्षण के उपाय

  1. जैव विविधता संरक्षण

    • संरक्षित क्षेत्रों और राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना।
  2. वन संरक्षण

    • वनों की कटाई रोकने और पुनर्वनीकरण को बढ़ावा देना।
  3. जलवायु परिवर्तन नियंत्रण

    • हरित गृह गैसों का उत्सर्जन कम करना।
  4. स्थानीय समुदायों की भागीदारी

    • संरक्षण परियोजनाओं में स्थानीय समुदायों को शामिल करना।

विश्व के प्राणी-भौगोलिक क्षेत्र (Zoo-geographical Regions of the World)

प्राणी-भौगोलिक क्षेत्र (Zoo-geographical Regions) पृथ्वी के उन बड़े भौगोलिक क्षेत्रों को कहते हैं जहाँ विशिष्ट प्रकार के जीव-जंतु पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों का विभाजन मुख्यतः जलवायु, भौगोलिक सीमाएँ, और जैविक विकास के आधार पर किया गया है।

इस वर्गीकरण का मुख्य उद्देश्य प्राणियों के वितरण और विविधता को समझना है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:


1. प्राणी-भौगोलिक क्षेत्रों का वर्गीकरण

प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्फ्रेड रसेल वॉलेस (Alfred Russel Wallace) ने पृथ्वी को 6 प्रमुख प्राणी-भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित किया। ये क्षेत्र हैं:


(i) पैलियाअर्कटिक क्षेत्र (Palaearctic Region)

स्थान

  • यह क्षेत्र यूरोप, उत्तरी अफ्रीका (सहारा के उत्तर), और एशिया के उत्तरी भाग को कवर करता है।

विशेषताएँ

  • यहाँ की जलवायु समशीतोष्ण (Temperate) और ठंडी है।
  • वनस्पति: शंकुधारी वन (Coniferous Forests), शीतोष्ण घास के मैदान।

प्रमुख जीव-जंतु

  • भेड़िया (Wolf)
  • भूरा भालू (Brown Bear)
  • लाल लोमड़ी (Red Fox)
  • साइबेरियन बाघ (Siberian Tiger)

(ii) नीअर्कटिक क्षेत्र (Nearctic Region)

स्थान

  • यह क्षेत्र उत्तरी अमेरिका, ग्रीनलैंड और मैक्सिको के उत्तरी भाग को कवर करता है।

विशेषताएँ

  • यहाँ समशीतोष्ण और आर्कटिक जलवायु पाई जाती है।
  • वनस्पति: शंकुधारी और पर्णपाती वन।

प्रमुख जीव-जंतु

  • बाइसन (Bison)
  • ग्रिजली भालू (Grizzly Bear)
  • पहाड़ी शेर (Mountain Lion)
  • अमेरिकन बिवर (American Beaver)

(iii) एथियोपियन क्षेत्र (Ethiopian Region)

स्थान

  • यह क्षेत्र सहारा रेगिस्तान के दक्षिण से लेकर अफ्रीका, मेडागास्कर, और अरब प्रायद्वीप के कुछ हिस्सों तक फैला है।

विशेषताएँ

  • यहाँ उष्णकटिबंधीय जलवायु है।
  • वनस्पति: उष्णकटिबंधीय वर्षावन, सवाना।

प्रमुख जीव-जंतु

  • शेर (Lion)
  • चीता (Cheetah)
  • हाथी (Elephant)
  • जिराफ (Giraffe)
  • मेडागास्कर के लीमर (Lemurs)

(iv) ओरिएंटल क्षेत्र (Oriental Region)

स्थान

  • यह क्षेत्र भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिण-पूर्व एशिया, और इंडोनेशियाई द्वीपों तक फैला है।

विशेषताएँ

  • यहाँ उष्णकटिबंधीय और मानसूनी जलवायु है।
  • वनस्पति: वर्षावन, सदाबहार वन।

प्रमुख जीव-जंतु

  • बंगाल टाइगर (Bengal Tiger)
  • भारतीय हाथी (Indian Elephant)
  • गैंडा (Rhinoceros)
  • बंदर (Monkeys)
  • मोर (Peacock)

(v) निओट्रॉपिकल क्षेत्र (Neotropical Region)

स्थान

  • यह क्षेत्र मध्य और दक्षिण अमेरिका तथा वेस्ट इंडीज को कवर करता है।

विशेषताएँ

  • यहाँ उष्णकटिबंधीय जलवायु है।
  • वनस्पति: घने वर्षावन।

प्रमुख जीव-जंतु

  • जगुआर (Jaguar)
  • आलसी भालू (Sloth)
  • पायथन (Python)
  • तोते (Parrots)
  • पिरान्हा मछली (Piranha Fish)

(vi) ऑस्ट्रेलियन क्षेत्र (Australian Region)

स्थान

  • यह क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया, न्यू गिनी, और प्रशांत महासागर के कुछ द्वीपों को कवर करता है।

विशेषताएँ

  • यहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय और शुष्क है।
  • वनस्पति: यूकेलिप्टस वन।

प्रमुख जीव-जंतु

  • कंगारू (Kangaroo)
  • कोआला (Koala)
  • एमु पक्षी (Emu)
  • प्लैटीपस (Platypus)
  • कुकाबुरा पक्षी (Kookaburra)

2. प्राणी-भौगोलिक क्षेत्रों का महत्व

  1. जैव विविधता का संरक्षण

    • इन क्षेत्रों का अध्ययन जैव विविधता को समझने और संरक्षित करने में मदद करता है।
  2. प्राकृतिक आवास का प्रबंधन

    • ये क्षेत्र प्राणियों के प्राकृतिक आवास को बनाए रखने में सहायक हैं।
  3. प्रवासी प्रजातियों का अध्ययन

    • प्रवासी पक्षी और जीव-जंतु इन क्षेत्रों में विशिष्ट मार्गों का उपयोग करते हैं।
  4. पर्यावरणीय अध्ययन

    • जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन करने में सहायक।

3. संरक्षण के उपाय

  1. राष्ट्रीय उद्यान और संरक्षित क्षेत्र

    • जैसे भारत में जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क।
  2. वन्यजीव संरक्षण कानून

    • अवैध शिकार और वनों की कटाई पर रोक।
  3. स्थानीय समुदायों की भागीदारी

    • संरक्षण प्रयासों में स्थानीय लोगों को शामिल करना।
  4. जैव विविधता के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयास

    • CITES (Convention on International Trade in Endangered Species) जैसे समझौते।

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