क्रिप्स मिशन और भारत छोड़ो आंदोलन
परिचय: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों को ब्रिटिश युद्ध प्रयासों में शामिल करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने क्रिप्स मिशन (1942) भेजा। मिशन की असफलता के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन (1942) की शुरुआत की। यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे व्यापक और निर्णायक चरण साबित हुआ।
क्रिप्स मिशन (1942):
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पृष्ठभूमि:
- द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) में ब्रिटिश सरकार को भारतीय संसाधनों और जनशक्ति की आवश्यकता थी।
- अमेरिका और चीन के दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार ने भारत में राजनीतिक संकट को हल करने और समर्थन प्राप्त करने के लिए क्रिप्स मिशन भेजा।
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नेतृत्व:
- सर स्टैफोर्ड क्रिप्स, ब्रिटिश मंत्रिमंडल के सदस्य।
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मुख्य प्रस्ताव:
- युद्ध समाप्ति के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस (स्वायत्तता) दिया जाएगा।
- भारत में एक संविधान सभा का गठन होगा, जिसमें भारतीय सदस्य अपना संविधान बनाएंगे।
- किसी भी प्रांत को नए संघ से बाहर निकलने की अनुमति होगी (यह विभाजन की ओर संकेत था)।
- ब्रिटिश सरकार भारतीय रक्षा और विदेश नीति पर नियंत्रण बनाए रखेगी।
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भारतीय प्रतिक्रिया:
- कांग्रेस: प्रस्तावों को खारिज कर दिया, क्योंकि यह "पूर्ण स्वतंत्रता" से कम था और विभाजन की संभावना को बढ़ावा देता था।
- मुस्लिम लीग: जिन्ना ने प्रस्ताव का समर्थन किया, क्योंकि यह विभाजन की दिशा में एक कदम था।
- अन्य दल: वामपंथी दलों ने प्रस्ताव को आंशिक रूप से स्वीकार किया।
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असफलता के कारण:
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद।
- ब्रिटिश सरकार का भारतीय नेतृत्व पर विश्वास न करना।
- भारतीय नेताओं को विश्वास नहीं था कि ब्रिटिश सरकार अपने वादों को पूरा करेगी।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942):
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पृष्ठभूमि:
- क्रिप्स मिशन की असफलता ने भारतीय नेताओं को निराश किया।
- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश शासन का आर्थिक और सामाजिक शोषण बढ़ गया।
- महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन के तत्काल अंत की मांग करते हुए आंदोलन शुरू किया।
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लक्ष्य:
- ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ने के लिए बाध्य करना।
- भारतीय जनता को स्वतंत्रता संग्राम में एकजुट करना।
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प्रमुख नारा:
- गांधीजी ने दिया: "अंग्रेजों भारत छोड़ो।"
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भारत छोड़ो प्रस्ताव:
- 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान (आज का अगस्त क्रांति मैदान) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया।
- गांधीजी ने अपने भाषण में कहा: "करो या मरो।"
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आंदोलन की शुरुआत:
- 9 अगस्त 1942 को आंदोलन शुरू होते ही गांधीजी और कांग्रेस के प्रमुख नेताओं (जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद आदि) को गिरफ्तार कर लिया गया।
- कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया गया, और ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए कठोर दमनकारी उपाय किए।
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जन आंदोलन:
- नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन स्वतःस्फूर्त बन गया।
- देशभर में जनता ने ब्रिटिश प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन, हड़ताल और बहिष्कार शुरू किए।
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में समान रूप से जनता का भाग लेना।
आंदोलन के प्रमुख घटनाक्रम:
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संगठित विद्रोह:
- रेलवे स्टेशन, पुलिस थानों, और डाकघरों पर हमले।
- सरकारी भवनों पर भारतीय तिरंगा फहराने की घटनाएं।
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छात्रों और युवाओं की भूमिका:
- छात्रों ने बड़े पैमाने पर भाग लिया और ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती दी।
- युवाओं ने भूमिगत संगठनों के माध्यम से आंदोलन को जीवित रखा।
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महिलाओं की भागीदारी:
- महिलाओं ने रैलियां आयोजित कीं और ब्रिटिश कानूनों का बहिष्कार किया।
- अरुणा आसफ अली ने आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और तिरंगा फहराने के लिए जानी गईं।
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ग्रामीण क्षेत्रों में आंदोलन:
- ग्रामीण जनता ने करों का भुगतान करने से इनकार कर दिया।
- कई स्थानों पर समानांतर सरकारें (Parallel Governments) स्थापित की गईं, जैसे:
- बलिया (उत्तर प्रदेश): चितू पांडे।
- तमलुक (पश्चिम बंगाल): तमलुक राष्ट्रीय सरकार।
- सतारा (महाराष्ट्र): प्रताप सिंह के नेतृत्व में।
ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया:
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कठोर दमन:
- आंदोलन को कुचलने के लिए सेना और पुलिस का व्यापक उपयोग किया गया।
- लाठीचार्ज, गोलीबारी, और सामूहिक गिरफ्तारियां की गईं।
- हजारों लोग मारे गए और लाखों को जेल भेजा गया।
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मीडिया और प्रचार पर रोक:
- भारतीय समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लागू की गई।
- ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को "अराजकता" करार दिया।
भारत छोड़ो आंदोलन के प्रभाव:
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राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन:
- आंदोलन ने पूरे भारत को एकजुट किया, जिसमें सभी वर्गों—किसानों, मजदूरों, छात्रों, और महिलाओं ने भाग लिया।
- यह स्वतंत्रता संग्राम का सबसे व्यापक और सशक्त जन आंदोलन बना।
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ब्रिटिश शासन पर दबाव:
- आंदोलन ने ब्रिटिश शासन को कमजोर कर दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि भारत पर अब अधिक समय तक शासन करना संभव नहीं है।
- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आंदोलन ने ब्रिटिश प्रशासन की मुश्किलें बढ़ा दीं।
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आंदोलन का दमन और बलिदान:
- ब्रिटिश सरकार के कठोर दमन के बावजूद आंदोलनकारी अपनी मांगों पर अड़े रहे।
- आंदोलन के दौरान कई लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी और हजारों लोग घायल या गिरफ्तार हुए।
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स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का योगदान:
- अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी, और अन्य महिलाओं ने आंदोलन में साहसिक भूमिका निभाई।
- महिलाओं ने नेतृत्व और संगठनात्मक क्षमता का प्रदर्शन किया।
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भूमिगत संगठनों का उदय:
- जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, और अन्य नेताओं ने भूमिगत संगठनों के माध्यम से आंदोलन को जीवित रखा।
- ये संगठन ब्रिटिश शासन के खिलाफ गुप्त रूप से काम करते रहे।
आंदोलन की सीमाएं:
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नेताओं की गिरफ्तारी:
- आंदोलन के प्रारंभ में ही गांधीजी और प्रमुख कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी के कारण आंदोलन को संगठित नेतृत्व नहीं मिल सका।
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सांप्रदायिक विभाजन:
- मुस्लिम लीग और अन्य सांप्रदायिक दलों ने इस आंदोलन से दूरी बनाए रखी।
- इससे राष्ट्रीय आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम एकता कमजोर हुई।
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आंशिक सफलताएं:
- आंदोलन का तात्कालिक उद्देश्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करना था, जो पूरा नहीं हो सका।
- हालांकि, आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम को अंतिम चरण में पहुंचा दिया।
भारत छोड़ो आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व:
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स्वतंत्रता की दिशा में निर्णायक कदम:
- यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम बड़ा जन आंदोलन था।
- इसने स्वतंत्रता प्राप्ति को अपरिहार्य बना दिया।
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अंतरराष्ट्रीय प्रभाव:
- आंदोलन ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत स्वतंत्रता के लिए पूरी तरह तैयार है।
- अमेरिका और अन्य देशों ने ब्रिटिश सरकार पर भारत को स्वतंत्रता देने के लिए दबाव डाला।
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स्वतंत्रता के लिए अंतिम प्रयास:
- आंदोलन के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं के साथ बातचीत शुरू की, जिसने स्वतंत्रता के मार्ग को प्रशस्त किया।
- 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने में इस आंदोलन का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
निष्कर्ष:
क्रिप्स मिशन और भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के निर्णायक चरण थे। क्रिप्स मिशन की असफलता ने भारतीय जनता में स्वतंत्रता की मांग को और प्रबल किया। भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीयों की एकता, साहस और बलिदान को प्रदर्शित किया। यद्यपि आंदोलन तात्कालिक रूप से सफल नहीं हुआ, लेकिन इसने स्वतंत्रता संग्राम को अंतिम चरण में पहुंचा दिया। यह आंदोलन स्वतंत्रता के लिए भारतीयों की अडिग प्रतिबद्धता और ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनकी सामूहिक शक्ति का प्रतीक बन गया। भारत छोड़ो आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय जनता अब ब्रिटिश शासन को और अधिक समय तक सहन नहीं करेगी, और इसने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया।