गोलमेज सम्मेलन
परिचय: गोलमेज सम्मेलन ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय नेताओं और हितधारकों के साथ संवैधानिक सुधारों पर चर्चा करने के लिए आयोजित बैठकें थीं। ये सम्मेलन 1930-1932 के बीच लंदन में आयोजित किए गए। ब्रिटिश सरकार ने इन सम्मेलनों के माध्यम से भारतीयों के बीच विभाजन की नीति को जारी रखा और स्वतंत्रता की मांगों को दबाने का प्रयास किया।
गोलमेज सम्मेलनों का पृष्ठभूमि:
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साइमन कमीशन और भारतीय असंतोष:
- 1927 में गठित साइमन कमीशन ने भारतीयों को नाराज किया क्योंकि इसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था।
- साइमन कमीशन के विरोध और नेहरू रिपोर्ट के कारण संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता महसूस हुई।
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सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930):
- महात्मा गांधी के नेतृत्व में इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन पर दबाव बनाया।
- आंदोलन के प्रभाव में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं के साथ बातचीत करने का निर्णय लिया।
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ब्रिटिश घोषणा:
- 1929: वायसराय लॉर्ड इरविन ने घोषणा की कि भारत को धीरे-धीरे "डोमिनियन स्टेटस" दिया जाएगा।
- इसके लिए गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन किया गया।
पहला गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1930 - जनवरी 1931):
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उद्देश्य:
- भारतीय प्रतिनिधियों और ब्रिटिश सरकार के बीच संवैधानिक सुधारों पर चर्चा करना।
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प्रतिनिधि:
- ब्रिटिश सरकार के अधिकारी।
- भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि।
- सांप्रदायिक समूहों और जातीय संगठनों के नेता।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अनुपस्थित थी क्योंकि वह सविनय अवज्ञा आंदोलन चला रही थी।
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मुख्य चर्चा:
- भारत को संवैधानिक सुधारों के तहत स्वायत्तता प्रदान करने पर विचार।
- विभिन्न समुदायों और रियासतों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास।
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परिणाम:
- यह सम्मेलन विफल रहा क्योंकि कांग्रेस जैसी प्रमुख राजनीतिक शक्ति की अनुपस्थिति के कारण कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जा सका।
दूसरा गोलमेज सम्मेलन (सितंबर 1931 - दिसंबर 1931):
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पृष्ठभूमि:
- गांधी-इरविन समझौते (मार्च 1931) के तहत महात्मा गांधी और कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित कर दिया।
- समझौते के आधार पर गांधीजी ने कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हुए इस सम्मेलन में भाग लिया।
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प्रतिनिधि:
- महात्मा गांधी (कांग्रेस का एकमात्र प्रतिनिधि)।
- भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि।
- मुस्लिम लीग और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के नेता।
- ब्रिटिश सरकार के अधिकारी।
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मुख्य मुद्दे:
- भारत को डोमिनियन स्टेटस देने पर चर्चा।
- अल्पसंख्यकों के अधिकार और पृथक निर्वाचक मंडल।
- भारतीय रियासतों का ब्रिटिश भारत में विलय।
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गांधीजी की भूमिका:
- गांधीजी ने भारत को पूर्ण स्वराज और एकीकृत भारतीय समाज की मांग उठाई।
- उन्होंने अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का विरोध किया, क्योंकि इससे सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा मिलता।
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मुस्लिम लीग और अल्पसंख्यक नेताओं की मांग:
- जिन्ना ने मुस्लिम लीग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल और अन्य विशेषाधिकारों की मांग की।
- सिख, एंग्लो-इंडियन, दलित और अन्य अल्पसंख्यकों ने भी अपनी अलग मांगें प्रस्तुत कीं।
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परिणाम:
- अल्पसंख्यक समूहों और कांग्रेस के बीच सहमति नहीं बन सकी।
- ब्रिटिश सरकार ने अल्पसंख्यकों की मांगों का समर्थन किया, जिससे गांधीजी असंतुष्ट रहे।
- यह सम्मेलन भी ठोस परिणाम देने में असफल रहा।
तीसरा गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1932 - दिसंबर 1932):
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पृष्ठभूमि:
- दूसरा गोलमेज सम्मेलन असफल होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं के साथ एक और बैठक का आह्वान किया।
- कांग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को दबाने के लिए कठोर कदम उठाए थे।
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प्रतिनिधि:
- ब्रिटिश सरकार के अधिकारी।
- भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि।
- मुस्लिम लीग और अन्य सांप्रदायिक समूहों के नेता।
- कांग्रेस अनुपस्थित थी।
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मुख्य चर्चा:
- संवैधानिक सुधारों के लिए रूपरेखा तैयार करना।
- भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक भविष्य पर चर्चा।
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परिणाम:
- कांग्रेस की अनुपस्थिति और नेताओं के बीच मतभेदों के कारण यह सम्मेलन भी विफल रहा।
- ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं की मांगों को अनदेखा करते हुए अपने शर्तों पर 1935 का भारत शासन अधिनियम तैयार किया।
गोलमेज सम्मेलनों का विश्लेषण और प्रभाव:
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ब्रिटिश सरकार की रणनीति:
- ब्रिटिश सरकार ने "फूट डालो और राज करो" की नीति का पालन करते हुए विभिन्न भारतीय समुदायों और रियासतों के बीच मतभेद बढ़ाने की कोशिश की।
- अल्पसंख्यकों की मांगों को प्राथमिकता देकर कांग्रेस को कमजोर करने का प्रयास किया गया।
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अल्पसंख्यक और सांप्रदायिक विभाजन:
- मुस्लिम लीग ने पृथक निर्वाचक मंडल और मुसलमानों के लिए विशेष अधिकारों की मांग को प्रबल किया।
- डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दलितों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की मांग उठाई, जिसे गांधीजी ने पूना पैक्ट (1932) के माध्यम से संबोधित किया।
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भारतीय रियासतों की भूमिका:
- भारतीय रियासतों के प्रतिनिधियों ने ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादारी दिखाते हुए किसी भी क्रांतिकारी बदलाव का विरोध किया।
- वे ब्रिटिश शासन के अधीन अपने विशेषाधिकार बनाए रखना चाहते थे।
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कांग्रेस की स्थिति:
- कांग्रेस ने पहले गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार किया और दूसरे में गांधीजी के नेतृत्व में भाग लिया।
- कांग्रेस का उद्देश्य था एकीकृत भारत के लिए संवैधानिक सुधारों को प्राप्त करना, लेकिन इसे अन्य समुदायों और ब्रिटिश सरकार के विरोध का सामना करना पड़ा।
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1935 का भारत शासन अधिनियम:
- गोलमेज सम्मेलनों की चर्चाओं और असफलताओं के बाद ब्रिटिश सरकार ने 1935 का भारत शासन अधिनियम पारित किया।
- इस अधिनियम ने प्रांतीय स्वायत्तता प्रदान की, लेकिन भारतीयों की स्वराज की मांग को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।
गोलमेज सम्मेलनों का महत्व:
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका:
- गोलमेज सम्मेलनों ने भारतीय नेताओं को संवैधानिक सुधारों पर चर्चा का अवसर प्रदान किया।
- यह भारतीय जनता के बीच स्वराज की मांग को और अधिक प्रबल करने में सहायक हुआ।
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राष्ट्रीय और सांप्रदायिक राजनीति का उभार:
- मुस्लिम लीग और अन्य अल्पसंख्यक समूहों की मांगों ने सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा दिया।
- कांग्रेस ने बहुसंख्यक समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत किया।
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अंतर्राष्ट्रीय मान्यता:
- गांधीजी के नेतृत्व और उनके विचारों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई।
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ब्रिटिश सरकार पर दबाव:
- गोलमेज सम्मेलनों ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष:
गोलमेज सम्मेलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण चरण थे, जहां भारतीय नेताओं और ब्रिटिश सरकार के बीच संवैधानिक सुधारों पर चर्चा हुई। हालांकि, ये सम्मेलन भारतीयों की स्वराज की मांग को पूरी तरह से स्वीकार करने में असफल रहे। सांप्रदायिक मांगों और ब्रिटिश विभाजनकारी नीतियों ने इन सम्मेलनों को व्यर्थ कर दिया। इसके बावजूद, गोलमेज सम्मेलनों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को गति दी और यह स्पष्ट किया कि भारत अब ब्रिटिश शासन के अधीन नहीं रह सकता। इन सम्मेलनों ने 1935 के भारत शासन अधिनियम की नींव रखी, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अगले चरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।