गांधीवादी चरण, खिलाफत और असहयोग आंदोलन
परिचय: गांधीवादी चरण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह समय था जब महात्मा गांधी ने अपने अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों से आंदोलन को नई दिशा दी। 1919 से 1947 तक गांधीजी ने कई राष्ट्रीय आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिनमें खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन ने भारतीय जनता को व्यापक रूप से एकजुट किया।
गांधीवादी चरण की पृष्ठभूमि:
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महात्मा गांधी का उदय:
- दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह और अहिंसा के सफल प्रयोग के बाद गांधीजी भारत लौटे (1915)।
- उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी रणनीतियों को लागू किया।
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प्रारंभिक कार्य:
- चंपारण सत्याग्रह (1917):
- बिहार में नील किसानों के शोषण के खिलाफ आंदोलन।
- गांधीजी का पहला सफल सत्याग्रह।
- अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918):
- बोनस की मांग के लिए सत्याग्रह।
- खेड़ा सत्याग्रह (1918):
- गुजरात में अकाल और कर वसूली के खिलाफ किसानों का आंदोलन।
- चंपारण सत्याग्रह (1917):
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जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919):
- ब्रिटिश शासन के अत्याचारों ने भारतीयों को गहराई से आघात पहुंचाया।
- इस घटना के बाद गांधीजी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ व्यापक आंदोलन की योजना बनाई।
खिलाफत आंदोलन (1919-1924):
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पृष्ठभूमि:
- प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के बाद तुर्की के खलीफा (मुसलमानों के धार्मिक नेता) की शक्ति समाप्त करने की ब्रिटिश नीति ने मुसलमानों में असंतोष बढ़ाया।
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नेतृत्व:
- अली बंधु (मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली)।
- गांधीजी ने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए इस आंदोलन का समर्थन किया।
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मुख्य उद्देश्य:
- खलीफा की सत्ता की पुनर्स्थापना।
- ब्रिटिश शासन के खिलाफ मुसलमानों को संगठित करना।
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खिलाफत आंदोलन का प्रभाव:
- हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा मिला।
- यह असहयोग आंदोलन के साथ जुड़कर एक राष्ट्रीय आंदोलन बन गया।
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अंत:
- 1924 में तुर्की में खलीफा की पदवी समाप्त होने के साथ यह आंदोलन समाप्त हो गया।
असहयोग आंदोलन (1920-1922):
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पृष्ठभूमि:
- जलियांवाला बाग हत्याकांड और रॉलेट एक्ट के बाद भारतीयों में असंतोष बढ़ा।
- खिलाफत आंदोलन और गांधीजी की नेतृत्व क्षमता ने जनता को संगठित किया।
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उद्देश्य:
- ब्रिटिश शासन से असहयोग करना।
- भारतीयों को स्वराज (स्वशासन) प्राप्त करना।
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मुख्य कार्यक्रम:
- सरकारी पदों, स्कूलों, कॉलेजों, और अदालतों का बहिष्कार।
- विदेशी वस्त्रों और ब्रिटिश सामान का बहिष्कार।
- स्वदेशी वस्तुओं और खादी को बढ़ावा।
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जनसहभागिता:
- इस आंदोलन में हर वर्ग ने भाग लिया: किसान, मजदूर, व्यापारी, महिलाएं।
- यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला जन आंदोलन बना।
असहयोग आंदोलन का विस्तार:
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सत्याग्रह और अहिंसा का प्रयोग:
- गांधीजी ने सत्याग्रह और अहिंसा को असहयोग आंदोलन की मूल नीति के रूप में अपनाया।
- आंदोलन ने हिंसक तरीकों को पूरी तरह नकार दिया।
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आंदोलन के प्रमुख केंद्र:
- बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, और दक्षिण भारत में आंदोलन ने जोर पकड़ा।
- विशेष रूप से किसानों और मजदूरों ने बड़े पैमाने पर भाग लिया।
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महिलाओं की भागीदारी:
- महिलाएं स्वदेशी वस्त्र बनाने और विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करने में सक्रिय थीं।
- सरोजिनी नायडू, कमला नेहरू, और अन्य महिला नेताओं ने आंदोलन में भाग लिया।
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खादी और स्वदेशी का प्रचार:
- विदेशी वस्त्रों और सामानों का सार्वजनिक रूप से बहिष्कार किया गया।
- खादी पहनने और स्वदेशी वस्त्रों को अपनाने का आह्वान किया गया।
असहयोग आंदोलन की प्रमुख घटनाएं:
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प्रिंस ऑफ वेल्स का बहिष्कार (1921):
- ब्रिटिश राजकुमार के भारत दौरे का व्यापक विरोध किया गया।
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सविनय अवज्ञा:
- अंग्रेजी कानूनों का पालन न करने और ब्रिटिश संस्थानों का बहिष्कार किया गया।
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चौरी-चौरा घटना (1922):
- उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में आंदोलन हिंसक हो गया।
- पुलिस थाने में आग लगाई गई, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए।
- इस घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन को वापस ले लिया।
असहयोग आंदोलन का प्रभाव:
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ब्रिटिश शासन पर दबाव:
- आंदोलन ने ब्रिटिश प्रशासन को झकझोर दिया और भारतीयों के विरोध को संगठित किया।
- ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ा, क्योंकि विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार व्यापक था।
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राष्ट्रीय एकता:
- हिंदू-मुस्लिम एकता का व्यापक उदाहरण देखा गया।
- आंदोलन में विभिन्न वर्गों की भागीदारी ने इसे एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन बना दिया।
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स्वराज का मार्ग:
- आंदोलन ने भारतीय जनता में स्वराज (स्वशासन) के लिए संघर्ष की भावना को मजबूत किया।
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महात्मा गांधी का प्रभाव:
- गांधीजी भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गए।
- उन्हें "राष्ट्रपिता" की उपाधि मिलने लगी।
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असफलता के कारण:
- चौरी-चौरा जैसी हिंसक घटनाओं ने गांधीजी को आंदोलन वापस लेने पर मजबूर किया।
- आंदोलन की असमय समाप्ति से जनता में निराशा उत्पन्न हुई।
असहयोग आंदोलन के बाद का प्रभाव:
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गांधीजी का नेतृत्व सुदृढ़ होना:
- असहयोग आंदोलन ने गांधीजी को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का निर्विवाद नेता बना दिया।
- उनके सिद्धांत अहिंसा और सत्याग्रह को व्यापक स्वीकृति मिली।
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राष्ट्रीय आंदोलन का जनाधार:
- आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम को ग्रामीण भारत और निम्न वर्गों तक पहुंचाया।
- किसानों, मजदूरों, और महिलाओं की भागीदारी ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक व्यापक जन आंदोलन बना दिया।
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हिंदू-मुस्लिम एकता में दरार:
- खिलाफत आंदोलन के अंत और असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद हिंदू-मुस्लिम एकता में गिरावट आई।
- मुस्लिम लीग ने धीरे-धीरे अपने एजेंडे को अलग दिशा दी।
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आंदोलन के बाद ब्रिटिश दमन:
- आंदोलन के दौरान गिरफ्तारियां और दमनकारी नीतियों ने जनता को प्रभावित किया।
- गांधीजी को 1922 में गिरफ्तार कर 6 साल की सजा दी गई (हालांकि वे 1924 में रिहा हो गए)।
असहयोग आंदोलन की सीमाएं:
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हिंसा का मुद्दा:
- चौरी-चौरा कांड जैसी घटनाओं से गांधीजी की अहिंसा नीति को झटका लगा।
- आंदोलन की असमय समाप्ति से जनता में निराशा फैली।
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सभी वर्गों का समर्थन नहीं:
- आंदोलन का प्रभाव मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों और शिक्षित वर्ग तक सीमित रहा।
- ग्रामीण और उद्योग मजदूरों की भागीदारी सीमित थी।
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व्यावहारिक लक्ष्य का अभाव:
- आंदोलन ने स्वराज का आह्वान किया, लेकिन इसे प्राप्त करने के लिए ठोस रणनीति का अभाव था।
खिलाफत और असहयोग आंदोलन का संयुक्त प्रभाव:
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राष्ट्रीय स्तर पर जन जागरूकता:
- आंदोलन ने भारतीय जनता को राष्ट्रीय चेतना और स्वशासन की आवश्यकता का एहसास कराया।
- यह स्वतंत्रता संग्राम का पहला जन आंदोलन था, जिसमें सभी वर्गों ने भाग लिया।
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ब्रिटिश शासन पर दबाव:
- आंदोलन के दौरान ब्रिटिश प्रशासन ने भारतीय जनता के असंतोष को महसूस किया।
- विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और कर नहीं चुकाने की घटनाओं ने ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया।
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गांधीजी का नेतृत्व:
- गांधीजी का सत्याग्रह और अहिंसा का सिद्धांत स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख साधन बन गया।
- उनका नेतृत्व स्वतंत्रता संग्राम के सभी प्रमुख आंदोलनों में महत्वपूर्ण रहा।
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स्वतंत्रता आंदोलन का नया चरण:
- असहयोग आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा और ऊर्जा प्रदान की।
- इससे भारतीय जनता में स्वराज प्राप्ति के लिए संघर्ष की भावना मजबूत हुई।
निष्कर्ष:
गांधीवादी चरण, खिलाफत और असहयोग आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का मील का पत्थर थे। इन आंदोलनों ने भारतीय जनता को संगठित किया, राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत किया, और स्वराज के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए गांधीजी के नेतृत्व में एकजुट किया। हालांकि असहयोग आंदोलन हिंसा के कारण समाप्त हो गया, लेकिन इसने स्वतंत्रता संग्राम की नींव को मजबूत किया।