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Indian Economy (SSC, Railway, Police & All State exam)Chapter Unit

बजट एवं लोक वित्त

बजट का परिचय (Introduction to Budget):
बजट (Budget) एक आधिकारिक दस्तावेज है जिसमें किसी सरकार की वार्षिक आय (Revenue) और व्यय (Expenditure) का विवरण होता है। यह सरकार की आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रतिबिंब है।


बजट की परिभाषा:

  1. आम अर्थ में:
    "बजट एक अनुमानित योजना है जो किसी वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की आय और व्यय का वर्णन करती है।"

  2. भारतीय संविधान के अनुसार:

    • अनुच्छेद 112 के तहत भारत सरकार के वार्षिक वित्तीय विवरण को "बजट" कहा जाता है।

बजट के प्रकार (Types of Budget):

  1. राजस्व बजट (Revenue Budget):

    • इसमें सरकार की नियमित आय और व्यय शामिल होते हैं।
    • उदाहरण: करों से प्राप्त आय और सरकारी कार्यालयों के खर्च।
  2. पूंजी बजट (Capital Budget):

    • इसमें दीर्घकालिक आय और व्यय शामिल होते हैं।
    • उदाहरण: अवसंरचना परियोजनाओं पर व्यय।
  3. संतुलित बजट (Balanced Budget):

    • जब सरकार की आय और व्यय समान होते हैं।
  4. घाटा बजट (Deficit Budget):

    • जब सरकार का व्यय उसकी आय से अधिक होता है।
  5. अधिशेष बजट (Surplus Budget):

    • जब सरकार की आय उसके व्यय से अधिक होती है।

बजट की प्रक्रिया (Budget Process in India):

  1. प्रारंभिक तैयारी:

    • बजट का प्रारंभिक मसौदा वित्त मंत्रालय द्वारा तैयार किया जाता है।
  2. कैबिनेट की स्वीकृति:

    • मसौदे को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जाता है।
  3. बजट का प्रस्तुतिकरण:

    • केंद्रीय वित्त मंत्री संसद में बजट पेश करते हैं।
  4. संसदीय चर्चा:

    • संसद में बजट पर विस्तृत चर्चा होती है।
  5. मंजूरी और क्रियान्वयन:

    • संसद द्वारा बजट पारित होने के बाद इसे लागू किया जाता है।

भारत में बजट का इतिहास (History of Budget in India):

  1. पहला बजट:

    • 1860 में जेम्स विल्सन ने ब्रिटिश भारत का पहला बजट पेश किया।
  2. स्वतंत्र भारत का पहला बजट:

    • आर. के. षणमुखम चेट्टी ने 1947 में पेश किया।
  3. गुलाबी बजट:

    • 2023 का बजट, जो कृषि और ग्रामीण विकास पर केंद्रित था।

लोक वित्त का परिचय (Introduction to Public Finance):
लोक वित्त (Public Finance) वह शाखा है जो सरकार की आय, व्यय, और सार्वजनिक ऋण का अध्ययन करती है। यह समाज के आर्थिक और सामाजिक विकास में सहायक होती है।


लोक वित्त के घटक (Components of Public Finance):

  1. सरकारी आय (Government Revenue):

    • राजस्व आय: कर और गैर-कर आय।
    • पूंजी आय: ऋण और संपत्ति की बिक्री।
  2. सरकारी व्यय (Government Expenditure):

    • राजस्व व्यय: नियमित प्रशासनिक खर्च।
    • पूंजी व्यय: अवसंरचना और विकास पर खर्च।
  3. सार्वजनिक ऋण (Public Debt):

    • सरकार द्वारा विभिन्न स्रोतों से लिया गया ऋण।
  4. वित्तीय घाटा (Fiscal Deficit):

    • जब सरकार का कुल व्यय उसकी कुल आय से अधिक होता है।
  5. राजकोषीय नीति (Fiscal Policy):

    • कराधान और सरकारी व्यय के माध्यम से अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने की नीति।

राजकोषीय नीति (Fiscal Policy):
राजकोषीय नीति का तात्पर्य सरकार की आय और व्यय के माध्यम से अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने और आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने की नीति से है।


राजकोषीय नीति के प्रकार (Types of Fiscal Policy):

  1. विस्तारवादी राजकोषीय नीति (Expansionary Fiscal Policy):

    • लक्ष्य: आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना।
    • उदाहरण:
      • सरकारी व्यय में वृद्धि।
      • करों में कटौती।
  2. संकुचनात्मक राजकोषीय नीति (Contractionary Fiscal Policy):

    • लक्ष्य: मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना।
    • उदाहरण:
      • सरकारी व्यय में कटौती।
      • करों में वृद्धि।

राजकोषीय नीति के घटक (Components of Fiscal Policy):

  1. कराधान (Taxation):

    • सरकार के राजस्व का प्रमुख स्रोत।
    • प्रकार:
      • प्रत्यक्ष कर (Direct Tax): आयकर, संपत्ति कर।
      • अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax): वस्तु एवं सेवा कर (GST)।
  2. सरकारी व्यय (Government Expenditure):

    • विकास व्यय: अवसंरचना, शिक्षा, और स्वास्थ्य पर खर्च।
    • गैर-विकास व्यय: प्रशासनिक खर्च, रक्षा व्यय।
  3. सार्वजनिक ऋण (Public Debt):

    • आंतरिक और बाहरी स्रोतों से ऋण।
  4. वित्तीय घाटा (Fiscal Deficit):

    • सरकार की आय और व्यय के बीच का अंतर।

बजट की चुनौतियां (Challenges of Budget):

  1. राजस्व संग्रह की कमी:

    • कर चोरी और अनुपालन की समस्याएं।
  2. बढ़ता वित्तीय घाटा:

    • व्यय अधिक और आय कम होने के कारण घाटा बढ़ता है।
  3. सरकारी व्यय का असंतुलन:

    • विकासात्मक और गैर-विकासात्मक व्यय में असंतुलन।
  4. जनसंख्या दबाव:

    • बढ़ती जनसंख्या के कारण संसाधनों की मांग अधिक हो जाती है।
  5. मुद्रास्फीति:

    • उच्च मुद्रास्फीति बजट की स्थिरता को प्रभावित करती है।

लोक वित्त में सुधार के उपाय (Reforms in Public Finance):

  1. कर सुधार:

    • जीएसटी जैसे एकीकृत कर प्रणाली को सशक्त बनाना।
    • कर चोरी को रोकने के लिए डिजिटल प्रणाली का उपयोग।
  2. सरकारी व्यय की प्राथमिकता:

    • शिक्षा, स्वास्थ्य, और अवसंरचना में अधिक निवेश।
    • गैर-जरूरी खर्चों में कटौती।
  3. राजकोषीय उत्तरदायित्व:

    • वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए सख्त उपाय।
    • राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (FRBM) का पालन।
  4. डिजिटल प्रौद्योगिकी का उपयोग:

    • सरकारी योजनाओं के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT)।
    • वित्तीय पारदर्शिता के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म।
  5. सार्वजनिक ऋण प्रबंधन:

    • ऋण पुनर्गठन और ऋण स्थिरता सुनिश्चित करना।

लोक वित्त के महत्व (Importance of Public Finance):

  1. आर्थिक स्थिरता:

    • राजकोषीय नीति के माध्यम से आर्थिक असंतुलन को नियंत्रित करना।
  2. सामाजिक कल्याण:

    • स्वास्थ्य, शिक्षा, और रोजगार योजनाओं के माध्यम से समाज के कमजोर वर्गों का उत्थान।
  3. अवसंरचना विकास:

    • सड़क, बिजली, और जल परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता।
  4. मुद्रास्फीति और मंदी का प्रबंधन:

    • सरकारी व्यय और कराधान के माध्यम से।

भारत में बजट और लोक वित्त के ऐतिहासिक सुधार (Historical Reforms in Budget and Public Finance in India):
भारतीय अर्थव्यवस्था में समय-समय पर बजट और लोक वित्त में सुधार किए गए हैं, ताकि इसे अधिक प्रभावी, पारदर्शी और समावेशी बनाया जा सके।


1. राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (FRBM Act), 2003:

  • उद्देश्य:
    • वित्तीय घाटे और राजस्व घाटे को नियंत्रित करना।
    • राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करना।
  • प्रभाव:
    • वित्तीय प्रबंधन में सुधार।

2. वस्तु एवं सेवा कर (GST), 2017:

  • उद्देश्य:
    • अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को सरल और एकीकृत करना।
  • प्रभाव:
    • कर संग्रह में वृद्धि।
    • व्यापार के लिए सहूलियत।

3. डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT):

  • उद्देश्य:
    • सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों के खाते में स्थानांतरित करना।
  • प्रभाव:
    • लीकेज में कमी और पारदर्शिता में वृद्धि।

4. बजट का डिजिटल रूप:

  • 2021 से, भारत का बजट पेपरलेस हो गया।
  • प्रभाव:
    • पर्यावरण अनुकूल और पारदर्शी प्रक्रिया।

वित्तीय संघवाद (Fiscal Federalism):
भारत में वित्तीय संघवाद का तात्पर्य केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय शक्तियों और संसाधनों के वितरण से है।

  1. संविधान के प्रावधान:

    • केंद्र और राज्यों के बीच कर और व्यय का स्पष्ट विभाजन।
    • उदाहरण: आयकर केंद्र का विषय है, जबकि संपत्ति कर राज्य का विषय है।
  2. वित्त आयोग:

    • प्रत्येक पांच साल में वित्त आयोग का गठन।
    • केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व के बंटवारे पर सिफारिशें।
  3. वित्तीय संघवाद को मजबूत करने के उपाय:

    • राज्यों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता।
    • GST परिषद का गठन।

बजट और लोक वित्त में चुनौतियां:

  1. असंतुलित संसाधन वितरण:

    • केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों का असमान वितरण।
  2. कर चोरी और अनुपालन की कमी:

    • कर प्रणाली में पारदर्शिता की कमी।
  3. घाटे का बढ़ता दबाव:

    • वित्तीय घाटे को नियंत्रित करना मुश्किल।
  4. लोक वित्त में पारदर्शिता की कमी:

    • कई बार योजनाओं का लाभ लक्षित समूह तक नहीं पहुंचता।

समग्र विकास में बजट और लोक वित्त की भूमिका (Role of Budget and Public Finance in Inclusive Growth):

  1. गरीबी उन्मूलन:

    • मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से।
  2. सामाजिक कल्याण:

    • शिक्षा, स्वास्थ्य, और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर व्यय।
  3. अवसंरचना विकास:

    • सड़क, परिवहन, ऊर्जा, और डिजिटल कनेक्टिविटी में निवेश।
  4. आर्थिक असमानता को कम करना:

    • राजकोषीय नीति के माध्यम से।
  5. पर्यावरणीय स्थिरता:

    • हरित परियोजनाओं और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए वित्तीय सहायता।

बजट और लोक वित्त का भविष्य (Future of Budget and Public Finance):

  1. डिजिटल वित्तीय प्रबंधन:

    • AI और ब्लॉकचेन का उपयोग।
  2. सतत विकास पर जोर:

    • पर्यावरण अनुकूल योजनाओं के लिए वित्तीय सहायता।
  3. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहयोग:

    • वैश्विक मंचों पर भारत की भागीदारी।
  4. स्थानीय निकायों को सशक्त बनाना:

    • वित्तीय स्वायत्तता और निधियों का विकेंद्रीकरण।

निष्कर्ष (Conclusion):
बजट और लोक वित्त भारत की आर्थिक संरचना की आधारशिला हैं। समय पर सुधार, तकनीकी नवाचार, और राजकोषीय अनुशासन से भारत के बजट और लोक वित्तीय तंत्र को अधिक प्रभावी और समावेशी बनाया जा सकता है। इससे देश की आर्थिक स्थिरता और समग्र विकास को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।

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