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/Human Physiology/Unit II
Human PhysiologyChapter Unit

रक्त और इसकी संरचना (Blood and Its Composition)

1. परिचय (Introduction):

रक्त शरीर में एक तरल संयोजी ऊतक (connective tissue) है, जो विभिन्न कार्यों के लिए जिम्मेदार है, जैसे पोषण, ऑक्सीजन का परिवहन, और अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन। यह शरीर में होमियोस्टेसिस (homeostasis) बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2. रक्त के घटक (Components of Blood):

रक्त मुख्यतः दो घटकों से मिलकर बना होता है:

  1. प्लाज्मा (Plasma):

    • यह रक्त का तरल भाग है, जो लगभग 55% रक्त का निर्माण करता है।
    • प्लाज्मा का 90-92% भाग पानी है, और बाकी भाग प्रोटीन, लवण, हार्मोन, एंजाइम, और अपशिष्ट पदार्थों से बना होता है।
    • प्लाज्मा प्रोटीन के मुख्य प्रकार:
      • एल्ब्यूमिन (Albumin): जल संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
      • ग्लोब्युलिन (Globulin): रोग प्रतिरोधकता (immunity) में सहायक।
      • फाइब्रिनोजेन (Fibrinogen): रक्त का थक्का (clot) बनाने में सहायक।
  2. रक्त कोशिकाएँ (Blood Cells):
    रक्त में तीन प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं:

    • लाल रक्त कणिकाएँ (Red Blood Cells - RBCs):

      • इन्हें इरिथ्रोसाइट्स (Erythrocytes) भी कहते हैं।
      • मुख्य कार्य: ऑक्सीजन का परिवहन करना।
      • इनका लाल रंग हीमोग्लोबिन (Hemoglobin) के कारण होता है।
      • जीवनकाल: लगभग 120 दिन।
      • उत्पादन का स्थान: अस्थि मज्जा (Bone Marrow)।
    • श्वेत रक्त कणिकाएँ (White Blood Cells - WBCs):

      • इन्हें ल्यूकोसाइट्स (Leukocytes) भी कहते हैं।
      • मुख्य कार्य: शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करना।
      • प्रकार:
        • ग्रैनुलोसाइट्स (Granulocytes): न्यूट्रोफिल्स, ईोसिनोफिल्स, और बेसोफिल्स।
        • एग्रैनुलोसाइट्स (Agranulocytes): लिम्फोसाइट्स और मोनोसाइट्स।
    • प्लेटलेट्स (Platelets):

      • इन्हें थ्रोम्बोसाइट्स (Thrombocytes) भी कहते हैं।
      • मुख्य कार्य: रक्त का थक्का बनाना और रक्तस्राव को रोकना।
      • जीवनकाल: लगभग 8-10 दिन।

3. रक्त के कार्य (Functions of Blood):

  1. परिवहन (Transport):

    • ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन।
    • पोषक तत्वों और हार्मोन्स का वितरण।
    • अपशिष्ट पदार्थों का उत्सर्जन।
  2. प्रतिरक्षा (Immunity):

    • WBCs शरीर को रोगाणुओं से बचाते हैं।
  3. होमियोस्टेसिस बनाए रखना (Maintaining Homeostasis):

    • शरीर के तापमान को नियंत्रित करना।
    • पीएच स्तर और द्रव संतुलन बनाए रखना।
  4. थक्का बनाना (Clotting):

    • चोट लगने पर प्लेटलेट्स रक्तस्राव को रोकने के लिए थक्का बनाते हैं।

4. रक्त की संरचना में असामान्यताएँ (Abnormalities in Blood Composition):

  • एनीमिया (Anemia): रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी।
  • ल्यूकेमिया (Leukemia): WBCs का असामान्य रूप से बढ़ना।
  • थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (Thrombocytopenia): प्लेटलेट्स की संख्या में कमी।

हृदय की संरचना और कार्य (Structure and Function of Heart)

1. परिचय (Introduction):

हृदय (Heart) एक मांसपेशीय अंग है, जो शरीर के परिसंचरण तंत्र (Circulatory System) का केंद्र है। यह ऑक्सीजन युक्त रक्त को पूरे शरीर में और ऑक्सीजन रहित रक्त को फेफड़ों तक पंप करता है। हृदय मानव छाती में, बाएँ और दाएँ फेफड़ों के बीच मध्यस्थ (mediastinum) में स्थित होता है।


2. हृदय की संरचना (Structure of the Heart):

हृदय चार कक्षों (Chambers) में विभाजित होता है:

  1. दो ऊपरी कक्ष (Atria):

    • दायां आलिंद (Right Atrium): शरीर से ऑक्सीजन रहित रक्त प्राप्त करता है।
    • बायां आलिंद (Left Atrium): फेफड़ों से ऑक्सीजन युक्त रक्त प्राप्त करता है।
  2. दो निचले कक्ष (Ventricles):

    • दायां निलय (Right Ventricle): ऑक्सीजन रहित रक्त को फेफड़ों में भेजता है।
    • बायां निलय (Left Ventricle): ऑक्सीजन युक्त रक्त को पूरे शरीर में पंप करता है।

3. हृदय की दीवार की परतें (Layers of the Heart Wall):

हृदय तीन परतों से बना होता है:

  1. एपिकार्डियम (Epicardium): यह बाहरी परत है जो हृदय की सुरक्षा करती है।
  2. मायोकार्डियम (Myocardium): यह मध्य परत है, जो हृदय की मांसपेशियों से बनी होती है और पंपिंग क्रिया करती है।
  3. एंडोकार्डियम (Endocardium): यह आंतरिक परत है, जो हृदय के अंदरूनी हिस्से को ढकती है।

4. हृदय की वाल्व प्रणाली (Heart Valve System):

हृदय में चार प्रमुख वाल्व होते हैं, जो रक्त प्रवाह को नियंत्रित करते हैं:

  1. त्रिकपर्दीय वाल्व (Tricuspid Valve): दायें आलिंद और दायें निलय के बीच स्थित।
  2. माइट्रल वाल्व (Mitral Valve): बायें आलिंद और बायें निलय के बीच स्थित।
  3. पल्मोनरी वाल्व (Pulmonary Valve): दायें निलय और फेफड़ों की धमनियों के बीच स्थित।
  4. एओर्टिक वाल्व (Aortic Valve): बायें निलय और महाधमनी (Aorta) के बीच स्थित।

5. रक्त प्रवाह का मार्ग (Pathway of Blood Flow):

  1. शरीर से ऑक्सीजन रहित रक्त सुपीरियर वेना कावा और इन्फीरियर वेना कावा के माध्यम से दायें आलिंद (Right Atrium) में प्रवेश करता है।
  2. दायें आलिंद से रक्त त्रिकपर्दीय वाल्व (Tricuspid Valve) से होकर दायें निलय (Right Ventricle) में जाता है।
  3. दायें निलय से रक्त पल्मोनरी वाल्व (Pulmonary Valve) के माध्यम से फेफड़ों में जाता है, जहां रक्त ऑक्सीजन प्राप्त करता है।
  4. फेफड़ों से ऑक्सीजन युक्त रक्त बायें आलिंद (Left Atrium) में प्रवेश करता है।
  5. बायें आलिंद से रक्त माइट्रल वाल्व (Mitral Valve) के माध्यम से बायें निलय (Left Ventricle) में जाता है।
  6. बायें निलय से रक्त एओर्टिक वाल्व (Aortic Valve) के माध्यम से महाधमनी (Aorta) में प्रवेश करता है और पूरे शरीर में पंप होता है।

6. हृदय की कार्यप्रणाली (Functions of the Heart):

  1. रक्त का पंप करना (Pumping of Blood):

    • हृदय ऑक्सीजन युक्त रक्त को शरीर के ऊतकों तक पहुँचाता है।
    • ऑक्सीजन रहित रक्त को फेफड़ों में ले जाता है।
  2. रक्त प्रवाह का नियंत्रण (Regulation of Blood Flow):

    • वाल्व रक्त प्रवाह को नियंत्रित करते हैं और इसे एक ही दिशा में प्रवाहित होने देते हैं।
  3. हृदय ताल (Heartbeat):

    • हृदय का पंपिंग कार्य विद्युत आवेगों (Electrical Impulses) द्वारा नियंत्रित होता है।
    • साइनोएट्रियल नोड (SA Node) और एट्रियोवेंट्रिकुलर नोड (AV Node) हृदय की धड़कन को नियंत्रित करते हैं।
  4. शरीर के लिए ऊर्जा प्रदान करना (Providing Energy to the Body):

    • हृदय के माध्यम से ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति होती है, जिससे शरीर के ऊतक ऊर्जा प्राप्त करते हैं।

7. हृदय की बीमारियाँ (Heart Diseases):

  1. हृदयाघात (Heart Attack): कोरोनरी धमनियों में रुकावट।
  2. एरिथमिया (Arrhythmia): हृदय ताल का असामान्य होना।
  3. हृदय विफलता (Heart Failure): हृदय का रक्त पंप करने में असमर्थ होना।

हृदय गति और हृदय चक्र (Heart Rate and Cardiac Cycle)

1. परिचय (Introduction):

हृदय शरीर के लिए रक्त परिसंचरण का केंद्र है। यह एक निश्चित लय में धड़कता है, जिसे हृदय गति (Heart Rate) कहते हैं। हृदय चक्र (Cardiac Cycle) हृदय की धड़कन की प्रक्रिया को दर्शाता है, जिसमें रक्त का हृदय के चार कक्षों से प्रवाह होता है।


हृदय गति (Heart Rate):

1. हृदय गति का अर्थ (Definition of Heart Rate):

  • हृदय गति एक मिनट में हृदय के संकुचन (Contractions) की संख्या को कहते हैं।
  • सामान्य वयस्क की हृदय गति: 60 से 100 बार प्रति मिनट।

2. हृदय गति को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Heart Rate):

  1. शारीरिक गतिविधि (Physical Activity): व्यायाम के दौरान हृदय गति बढ़ती है।
  2. मानसिक तनाव (Mental Stress): तनाव और चिंता से हृदय गति तेज हो जाती है।
  3. आयु (Age): बच्चों की हृदय गति वयस्कों से अधिक होती है।
  4. शरीर की स्थिति (Body Position): लेटे रहने और खड़े होने पर हृदय गति में परिवर्तन होता है।
  5. हॉर्मोन (Hormones): जैसे एड्रेनालिन (Adrenaline) हृदय गति को बढ़ाता है।
  6. स्वास्थ्य की स्थिति (Health Condition): जैसे एरिथमिया (Arrhythmia) हृदय गति को असामान्य बना सकता है।

3. हृदय गति का नियंत्रण (Regulation of Heart Rate):

  • सिनोएट्रियल नोड (SA Node):
    • हृदय का प्राकृतिक पेसमेकर।
    • विद्युत आवेग उत्पन्न करता है, जिससे हृदय की धड़कन नियंत्रित होती है।
  • स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic Nervous System):
    • सहानुभूतिक तंत्रिका तंत्र (Sympathetic Nervous System): हृदय गति बढ़ाता है।
    • पारासहानुभूतिक तंत्रिका तंत्र (Parasympathetic Nervous System): हृदय गति को धीमा करता है।

हृदय चक्र (Cardiac Cycle):

1. हृदय चक्र का अर्थ (Definition of Cardiac Cycle):

  • हृदय चक्र हृदय की एक धड़कन की संपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें आलिंद (Atria) और निलय (Ventricle) संकुचित और शिथिल होते हैं।
  • समय: लगभग 0.8 सेकंड।

2. हृदय चक्र के चरण (Phases of Cardiac Cycle):

हृदय चक्र को तीन चरणों में विभाजित किया जाता है:

  1. आलिंद संकुचन (Atrial Systole):

    • समय: 0.1 सेकंड।
    • आलिंद संकुचित होकर रक्त को निलयों में भेजते हैं।
    • इस दौरान त्रिकपर्दीय (Tricuspid) और माइट्रल वाल्व (Mitral Valve) खुले रहते हैं।
  2. निलय संकुचन (Ventricular Systole):

    • समय: 0.3 सेकंड।
    • निलय संकुचित होकर रक्त को महाधमनी (Aorta) और फुफ्फुसीय धमनियों (Pulmonary Arteries) में पंप करते हैं।
    • इस दौरान त्रिकपर्दीय और माइट्रल वाल्व बंद हो जाते हैं, और पल्मोनरी व एओर्टिक वाल्व खुल जाते हैं।
  3. संपूर्ण हृदय शिथिलता (Complete Cardiac Diastole):

    • समय: 0.4 सेकंड।
    • आलिंद और निलय शिथिल होते हैं।
    • रक्त दायें आलिंद में सुपीरियर और इन्फीरियर वेना कावा (Superior and Inferior Vena Cava) से और बायें आलिंद में पल्मोनरी नसों (Pulmonary Veins) से प्रवेश करता है।

3. रक्त प्रवाह का क्रम (Sequence of Blood Flow in Cardiac Cycle):

  1. ऑक्सीजन रहित रक्त दायें आलिंद में प्रवेश करता है।
  2. दायें आलिंद से यह रक्त दायें निलय में जाता है।
  3. दायें निलय से यह रक्त फेफड़ों में पंप होता है।
  4. फेफड़ों से ऑक्सीजन युक्त रक्त बायें आलिंद में लौटता है।
  5. बायें आलिंद से रक्त बायें निलय में जाता है।
  6. बायें निलय से रक्त महाधमनी के माध्यम से पूरे शरीर में पंप होता है।

4. हृदय चक्र का महत्व (Importance of Cardiac Cycle):

  • रक्त का निरंतर प्रवाह सुनिश्चित करता है।
  • ऑक्सीजन और पोषक तत्वों का परिवहन करता है।
  • अपशिष्ट पदार्थों का उत्सर्जन करता है।

श्वसन तंत्र: श्वसन मार्ग का सामान्य परिचय (Respiratory System: General Overview of the Respiratory Passage)

1. परिचय (Introduction):

श्वसन तंत्र (Respiratory System) वह प्रणाली है जो शरीर में ऑक्सीजन का आदान-प्रदान करती है और कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालती है। यह प्रणाली फेफड़ों और श्वसन मार्गों के माध्यम से वायुमंडल से गैसों का परिवहन सुनिश्चित करती है।


2. श्वसन मार्ग का सामान्य विवरण (General Overview of Respiratory Passage):

श्वसन मार्ग हवा को फेफड़ों तक पहुँचाने और वहाँ से बाहर निकालने के लिए जिम्मेदार है। इसे मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता है:

  1. ऊपरी श्वसन मार्ग (Upper Respiratory Tract):

    • नाक (Nose)
    • ग्रसनी (Pharynx)
    • स्वरयंत्र (Larynx)
  2. निचला श्वसन मार्ग (Lower Respiratory Tract):

    • श्वासनली (Trachea)
    • ब्रोंकस (Bronchi)
    • फेफड़े (Lungs)

3. श्वसन मार्ग के प्रमुख अंग (Major Organs of the Respiratory Passage):

(A) नाक (Nose):
  1. बाहरी नाक (External Nose):
    • हवा को शरीर में प्रवेश करने का पहला स्थान।
    • नथुने (Nostrils) और नाक की संरचना से बना।
  2. नाक गुहा (Nasal Cavity):
    • हवा को शुद्ध, नम और गर्म करने के लिए जिम्मेदार।
    • नाक में मौजूद बाल और श्लेष्मा (Mucus) धूल और रोगाणुओं को रोकते हैं।
(B) ग्रसनी (Pharynx):
  • यह नाक और मुँह को स्वरयंत्र और अन्नप्रणाली से जोड़ता है।
  • इसमें तीन भाग होते हैं:
    1. नासोफैरिंक्स (Nasopharynx): नाक के पीछे का भाग।
    2. ऑरोफैरिंक्स (Oropharynx): मुँह के पीछे का भाग।
    3. लैरिंजोफैरिंक्स (Laryngopharynx): स्वरयंत्र से जुड़ा भाग।
(C) स्वरयंत्र (Larynx):
  • इसे "वॉयस बॉक्स" भी कहते हैं।
  • यह हवा को श्वासनली तक पहुँचाने और भोजन को रोकने का कार्य करता है।
  • इसमें एपिग्लॉटिस (Epiglottis) होता है, जो भोजन और हवा के रास्ते को अलग करता है।
(D) श्वासनली (Trachea):
  • यह 10-12 सेमी लंबी एक नली होती है, जो स्वरयंत्र को ब्रोंकस से जोड़ती है।
  • इसमें "सी" के आकार के उपास्थि छल्ले (Cartilage Rings) होते हैं, जो इसे ढहने से बचाते हैं।
(E) ब्रोंकस (Bronchi):
  • श्वासनली फेफड़ों के पास पहुँचकर दो भागों में विभाजित हो जाती है:
    1. दायां ब्रोंकस (Right Bronchus): दायें फेफड़े की ओर जाता है।
    2. बायां ब्रोंकस (Left Bronchus): बायें फेफड़े की ओर जाता है।
  • ब्रोंकस छोटे-छोटे ब्रोंकियोल्स (Bronchioles) में विभाजित हो जाते हैं।
(F) फेफड़े (Lungs):
  • फेफड़े श्वसन तंत्र का प्रमुख अंग हैं, जहां गैसों का आदान-प्रदान होता है।
  • प्रत्येक फेफड़े में अल्वेओल्स (Alveoli) होते हैं, जो गैसों के आदान-प्रदान का मुख्य स्थान हैं।

4. श्वसन मार्ग की कार्यप्रणाली (Functions of the Respiratory Passage):

  1. वायु का परिवहन (Transport of Air):
    • वायु को बाहर से फेफड़ों तक और फेफड़ों से बाहर तक पहुँचाना।
  2. वायु का शुद्धिकरण (Purification of Air):
    • धूल, रोगाणु और अन्य कणों को रोकना और शुद्ध वायु को फेफड़ों तक पहुँचाना।
  3. वायु का तापमान बनाए रखना (Temperature Regulation):
    • वायु को गर्म और नम रखना।
  4. गैसों का आदान-प्रदान (Gas Exchange):
    • ऑक्सीजन को रक्त में और कार्बन डाइऑक्साइड को वायुमंडल में स्थानांतरित करना।

5. श्वसन मार्ग से संबंधित समस्याएँ (Respiratory Passage Disorders):

  1. अस्थमा (Asthma): श्वसन मार्ग की सूजन और सिकुड़न।
  2. साइनसाइटिस (Sinusitis): नाक के साइनस की सूजन।
  3. ब्रोंकाइटिस (Bronchitis): ब्रोंकस की सूजन।
  4. सीओपीडी (COPD): श्वसन मार्ग में दीर्घकालिक रुकावट।

फेफड़े: संरचना और कार्य (Lungs: Structure and Functions)

1. परिचय (Introduction):

फेफड़े (Lungs) श्वसन तंत्र के प्रमुख अंग हैं। यह जोड़ीदार अंग (paired organ) वक्ष गुहा (thoracic cavity) में स्थित हैं और शरीर में गैसों के आदान-प्रदान का मुख्य कार्य करते हैं। फेफड़े शरीर को ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालते हैं।


फेफड़ों की संरचना (Structure of Lungs):

1. स्थिति (Location):

  • फेफड़े वक्ष गुहा के भीतर स्थित होते हैं।
  • दायाँ फेफड़ा (Right Lung) और बायाँ फेफड़ा (Left Lung) हृदय और अन्य अंगों से घिरे होते हैं।
  • दायाँ फेफड़ा बाएँ फेफड़े से बड़ा और चौड़ा होता है क्योंकि हृदय बाईं ओर स्थित होता है।

2. आकार और विभाजन (Size and Lobes):

  1. दायाँ फेफड़ा (Right Lung):
    • तीन खंडों (lobes) में विभाजित:
      • ऊपरी खंड (Superior Lobe)
      • मध्य खंड (Middle Lobe)
      • निचला खंड (Inferior Lobe)
  2. बायाँ फेफड़ा (Left Lung):
    • दो खंडों में विभाजित:
      • ऊपरी खंड (Superior Lobe)
      • निचला खंड (Inferior Lobe)
    • इसमें कार्डिएक नॉच (Cardiac Notch) होता है, जो हृदय के लिए जगह प्रदान करता है।

3. आंतरिक संरचना (Internal Structure):

  1. ब्रोंकस और ब्रोंकियोल्स (Bronchi and Bronchioles):

    • ब्रोंकस फेफड़ों में प्रवेश करते हैं और छोटे ब्रोंकियोल्स में विभाजित हो जाते हैं।
    • ब्रोंकियोल्स हवा को अल्वेओल्स तक पहुँचाते हैं।
  2. अल्वेओल्स (Alveoli):

    • फेफड़ों में छोटे-छोटे थैलीनुमा संरचनाएँ।
    • प्रत्येक फेफड़े में लगभग 30 करोड़ अल्वेओल्स होते हैं।
    • यह गैसों के आदान-प्रदान (ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड) का मुख्य स्थान है।
  3. प्लूरा (Pleura):

    • फेफड़ों को ढकने वाली दोहरी झिल्ली।
    • प्लूरल कैविटी (Pleural Cavity): दोनों झिल्लियों के बीच का स्थान, जो चिकनाई प्रदान करता है और फेफड़ों की रक्षा करता है।
  4. रक्तवाहिनियाँ (Blood Vessels):

    • फेफड़ों में पल्मोनरी आर्टरी ऑक्सीजन रहित रक्त लाती है और पल्मोनरी वेन्स ऑक्सीजन युक्त रक्त ले जाती हैं।

फेफड़ों के कार्य (Functions of Lungs):

1. गैसों का आदान-प्रदान (Gas Exchange):

  • ऑक्सीजन को वायुमंडल से रक्त में स्थानांतरित करना।
  • कार्बन डाइऑक्साइड को रक्त से वायुमंडल में बाहर निकालना।

2. पीएच संतुलन बनाए रखना (Maintaining pH Balance):

  • रक्त का पीएच स्तर स्थिर बनाए रखने में सहायक।
  • अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड को हटाकर अम्लीयता (acidity) को नियंत्रित करना।

3. प्रतिरक्षा प्रदान करना (Providing Immunity):

  • वायु के साथ आने वाले रोगाणुओं और धूल-कणों को रोकना।
  • फेफड़ों की श्लेष्मा झिल्ली (Mucous Membrane) और सिलिया (Cilia) हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालते हैं।

4. शरीर के तापमान को नियंत्रित करना (Regulating Body Temperature):

  • वायु को नम और गर्म करना।

5. रक्तचाप को नियंत्रित करना (Regulating Blood Pressure):

  • फेफड़े एंजियोटेंसिन-कन्वर्टिंग एंजाइम (ACE) का उत्पादन करते हैं, जो रक्तचाप को नियंत्रित करता है।

6. ध्वनि उत्पादन में सहायता (Assisting in Sound Production):

  • फेफड़ों से निकली हवा स्वरयंत्र (Larynx) के माध्यम से ध्वनि उत्पन्न करती है।

फेफड़ों से संबंधित समस्याएँ (Lung-Related Disorders):

  1. अस्थमा (Asthma): फेफड़ों की वायुमार्ग की सूजन।
  2. ब्रोंकाइटिस (Bronchitis): ब्रोंकस की सूजन।
  3. निमोनिया (Pneumonia): फेफड़ों में संक्रमण।
  4. फेफड़ों का कैंसर (Lung Cancer): कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि।
  5. सीओपीडी (COPD): दीर्घकालिक वायुमार्ग रुकावट।

श्वसन की प्रक्रिया का तंत्र (Mechanism of Respiration)

1. परिचय (Introduction):

श्वसन (Respiration) वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से शरीर वातावरण से ऑक्सीजन ग्रहण करता है और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालता है। यह प्रक्रिया दो प्रमुख चरणों में पूरी होती है:

  1. बाहरी श्वसन (External Respiration): वायुमंडल और फेफड़ों के बीच गैसों का आदान-प्रदान।
  2. आंतरिक श्वसन (Internal Respiration): रक्त और शरीर के ऊतकों के बीच गैसों का आदान-प्रदान।

श्वसन की प्रक्रिया के चरण (Stages of the Mechanism of Respiration):

1. प्रेरणा (Inhalation):

  • इसे श्वसन ग्रहण करना (Inspiration) भी कहते हैं।
  • प्रेरणा के दौरान वायुमंडल से ऑक्सीजन युक्त वायु फेफड़ों में प्रवेश करती है।

चरण:

  1. डायाफ्राम का संकुचन (Contraction of Diaphragm):
    • डायाफ्राम (Diaphragm) नीचे की ओर खिंचता है, जिससे वक्ष गुहा (Thoracic Cavity) का आकार बढ़ता है।
  2. अंतरपसली मांसपेशियों का संकुचन (Intercostal Muscles Contraction):
    • पसलियों को ऊपर और बाहर की ओर उठाती हैं।
  3. वक्ष गुहा में दाब का कम होना (Decrease in Thoracic Pressure):
    • वक्ष गुहा का विस्तार होने से फेफड़ों में नकारात्मक दबाव (Negative Pressure) उत्पन्न होता है, जो हवा को फेफड़ों में खींचता है।

परिणाम (Result):

  • वायुमंडल की हवा फेफड़ों के अल्वेओल्स (Alveoli) तक पहुँचती है।

2. श्वसन (Gaseous Exchange):

  • यह प्रक्रिया फेफड़ों के अल्वेओल्स और रक्त के बीच होती है।
  1. ऑक्सीजन का आदान-प्रदान:
    • अल्वेओल्स में उच्च ऑक्सीजन सांद्रता होती है, जबकि रक्त में इसकी सांद्रता कम होती है।
    • ऑक्सीजन का प्रसार (Diffusion) अल्वेओल्स से रक्त में होता है।
  2. कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान:
    • रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता अधिक होती है, जबकि अल्वेओल्स में कम।
    • कार्बन डाइऑक्साइड का प्रसार रक्त से अल्वेओल्स में होता है।

3. उत्सर्जन (Exhalation):

  • इसे श्वसन त्यागना (Expiration) भी कहते हैं।
  • इस चरण में फेफड़ों से कार्बन डाइऑक्साइड युक्त वायु बाहर निकलती है।

चरण:

  1. डायाफ्राम का शिथिल होना (Relaxation of Diaphragm):
    • डायाफ्राम ऊपर की ओर उठता है, जिससे वक्ष गुहा का आकार घटता है।
  2. अंतरपसली मांसपेशियों का शिथिल होना (Intercostal Muscles Relaxation):
    • पसलियाँ अपनी सामान्य स्थिति में लौटती हैं।
  3. वक्ष गुहा में दाब का बढ़ना (Increase in Thoracic Pressure):
    • फेफड़ों में दबाव बढ़ने से वायु बाहर की ओर निकलती है।

परिणाम (Result):

  • कार्बन डाइऑक्साइड युक्त वायु वायुमंडल में निकल जाती है।

श्वसन के लिए जिम्मेदार संरचनाएँ (Structures Involved in Respiration):

  1. डायाफ्राम (Diaphragm): प्रमुख श्वसन मांसपेशी, जो वक्ष गुहा का विस्तार और संकुचन करती है।
  2. अंतरपसली मांसपेशियाँ (Intercostal Muscles): पसलियों को हिलाने में सहायक।
  3. अल्वेओल्स (Alveoli): गैसों के आदान-प्रदान का मुख्य स्थान।
  4. श्वासनली और ब्रोंकस (Trachea and Bronchi): वायु को फेफड़ों तक पहुँचाने का कार्य करती हैं।

श्वसन की प्रक्रिया के नियंत्रण (Control of Respiration):

  1. न्यूरल नियंत्रण (Neural Control):
    • मेडुला ऑब्लोंगाटा (Medulla Oblongata): श्वसन प्रक्रिया का प्राथमिक नियंत्रण केंद्र।
    • पोंस (Pons): श्वसन की लय (Rhythm) को नियंत्रित करता है।
  2. रासायनिक नियंत्रण (Chemical Control):
    • रक्त में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता श्वसन की गति को प्रभावित करती है।
    • कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ने पर: श्वसन दर बढ़ जाती है।
    • ऑक्सीजन का स्तर घटने पर: प्रेरणा में वृद्धि होती है।

श्वसन प्रक्रिया का महत्व (Significance of Respiration):

  1. ऊर्जा उत्पादन (Energy Production):
    • कोशिकाओं में ऑक्सीजन के उपयोग से ऊर्जा उत्पन्न होती है।
  2. कार्बन डाइऑक्साइड का निष्कासन (Removal of Carbon Dioxide):
    • अपशिष्ट पदार्थ को बाहर निकालकर रक्त को शुद्ध करता है।
  3. होमियोस्टेसिस बनाए रखना (Maintaining Homeostasis):
    • रक्त का पीएच संतुलन बनाए रखता है।

श्वसन प्रक्रिया से संबंधित समस्याएँ (Respiratory Disorders):

  1. अस्थमा (Asthma): श्वसन मार्ग की रुकावट।
  2. ब्रोंकाइटिस (Bronchitis): श्वासनली की सूजन।
  3. सीओपीडी (COPD): दीर्घकालिक श्वसन विकार।
  4. निमोनिया (Pneumonia): फेफड़ों में संक्रमण।

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